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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1009

From जैनकोष



विषयेषु यथा चित्तं जंतोर्मग्नमनाकुलम्।

तथा यद्यात्मनस्तत्त्वे सद्य: को न शिवीभवेत्।।1009।।

अंतस्तत्त्व में मग्नता होने पर शिवस्वरूप होने की नि:संदेहता का प्रतिपादन― जिस प्रकार प्राणी का चित्त विषयों में मग्न होता है, अनाकुल होकर मग्न होता है, अनाकुल तो होता नहीं अर्थात् वहाँ यह जानना कि न तो कल्याण की आकुलता है उसे न आत्मोद्धार की आकुलता है, विषयों में मग्न होने वाला पुरुष ऐसा अनाकुल है। याने उसे अपनी फिकर नहीं कि मेरी बरबादी होगी, जन्म मरण होंगे, संसार में दु:खी बनना पड़ेगा।कोर्इ आकुलता नहीं कर रहा है, अलंकार में कहा है, जैसे यह प्राणी व्याकुल रहकर याने विषयों की प्रवृत्ति के अतिरिक्त और कोर्इ बात ध्यान में न लाकर जैसे जहाँमग्न रहा करते हैं, इस तरह यदि आत्मतत्त्व में मग्न हो जाय वे तो फिर क्यों न शीघ्र ही मोक्षतत्त्व को प्राप्त कर लें। विषयों का अनुभवन प्राणी कितनी लीनता के साथ करता है। जैसे जिसे खाने का लोभ है वह उसको ऐसी लीनता से खायगा कि वह आगे की बात न विचारेगा कि इससे मुझे कष्ट होगा और न दूसरे की बात विचारेगा कि इसमें दूसरों को कष्ट होगा। कुछ भी ख्याल नहीं करता, अपने उस रसास्वाद में ऐसा मस्त हो रहा कि कुछ सुध-बुध नहीं रहती। और, स्पर्शनइंद्रिय का जो विषय है जिसे कहेंगे काम वह तो इतना गंदा विषय है और इतनी तीव्रता को लाने वाला है कि उसमें कुछ सुध रख ही नहीं पाता है, ऐसा नियम होता है। आगे पीछे कीखबर नहीं रहती। जैसे बिल्ली चूहे को पा ले, और उस बिल्ली पर कोई डंडा भी मारे कि छोड दे तो वह बिल्ली डंडे सह लेगी पर उस चूहे को नहीं छोड़ती ठीक ऐसी ही प्रवृत्ति विषयासक्त पुरुषों की होती है। बात यह बताई जा रही लीनता की कि किस लीनता से विषय भोग रहा, ऐसी लीनता से यदि आत्मा के स्वरूप में कोई प्रवेश करे, लीन हो जाय तो वह मोक्ष स्वरूप अवश्य बन जायगा। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है, जैसे लड़कों को लाठी दे दें तो वे लड़के क्या करते कि इसको दोनों पैरों के बीच करके घोड़ा-घोड़ा खेलते हैं। तो उस घोड़े से क्या काम बनेगा? और जो वास्तविक घोड़ा है चाहे वह उद्दंड है, कुपथ में ले जाने वाला हैलेकिन उसे वश कर लिया जाय लगाम से किसी प्रकार से जो उसे सुपथ में भी लाया जा सकता है, गमन करने का माद्दा तो है जीव में, आज कुपथ में है, तत्त्वज्ञान जगे तो विषयों से हटकर सुपथ में भी लीन हो सकते। उस ही लीनता की तुलना यहाँकी है, ऐसी लीनता बड़े काम की है, मगर विषयों में लीनता तो संसार संकटों में फँसाने वाली है और आत्म स्वरूप में इस ढंग की लीनता हो जाय कि किसी अन्य का ख्याल न लायें, ऐसी अगर लीनता होती है तो वह नियम से शिव स्वरूप हो जायगा।


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