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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1010

From जैनकोष



अतृप्तिजनकं मोहदाववह् नेर्महेंधनंम्।

असातसंततेर्बीजमक्षसौरव्वं जगुर्जिना:।।1010।।

इंद्रियसुख की अतृप्तिजनकता― जिनेश्वर देव ने इन इंद्रियजनित सुखों को अतृप्तिजनक कहा हैयाने ये सुखतृप्ति उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। यह बात सभी अपने अनुभव से समझ सकते हैं कि इंद्रिय का विषय भोगकर कोई भी आज तब तृप्त नहीं रहा। तृप्त होने की बात तो दूर रहो, ज्यों-ज्यों भोगसाधन मिले त्यों-त्यों असंतोष, अतृप्ति, तृष्णा बढ़ती गई। जैसे एक खाने का ही इंद्रियविषय देखिये रोज वैसा ही खाना खाते हैं, पर खा कर कोई तृप्त हुआ क्या?क्या कोई इस तरह खाता है कि हमने कल तो इसका स्वाद समझ लिया था, अब हमें स्वाद लेने से मतलब नहीं रहा, हमें तो सिर्फ पेट भरना है। वह तो खाता है और उसमें मौज मानता है और उससे भी अधिक तृष्णा रहती है कि और कुछ अधिक रसीला भोजन हो, एक विषय की बात क्या, सभी विषयों की यही बात है। विषयों के भोगते-भोगते भी देखो अज्ञानी प्राणियों का मन नहीं भरता कि अब नहीं भोगना। खूब बढ़िया राग भरे शब्द सुन लिया, अब हमें जीवन में जरूरत न पड़ेगी, ऐसा कोई मनुष्य कर पाता हे क्या? जो करता है वह विरला ही है। इसी प्रकार देख लो खूब रूप डटकर देख लो बराबर एक टक लगाकर और देखकर इतना तृप्त हो जावो कि यह मन कह बैठे कि अब जिंदगी में रूप देखने का काम तो नहीं रहा। सभी इंद्रिय की ऐसी ही बात हे कि ये इंद्रियजनित सुख जीव को तृप्ति उत्पन्न नहीं करते, किंतु इनसे तृष्णा औरअतृप्ति ही बढ़ाते हैं, और इसीलिए इसके त्याग को धर्म कहते हैं, धर्म वह है कि जिससे हमें सत्य सुख मिल जाय। यदि ये विषय साधन कभी हटते नहीं, सदा पास रहते, मनमाने पास रहते तो यह भी कह सकते थे कि चलो विषयभोग ही धर्म है। आत्मा को तो हित चाहिए। अगर यों ही मिल जाता होता तो उसको मना करने की कोई जरूरत न थी, लेकिन ऐसा है कहाँ? पराधीन हैं, विनाशीक हैं, क्षोभ से भरे हुए हैं, भविष्य में भी दु:ख के कारण हैं, पापरूप हैं, पाप का कारण है, सारे अनर्थ हैं इस कारण ये इंद्रियजनित सुख हेय हैं। एक ही निर्णय बनायें कि किसी भी स्थिति में इंद्रियजंय सुख उपादेय नहीं हो सकता। किसी भी स्थिति की बात यों कही कि जब इस जीव का राग बढ़ जाता है, न हो राग पहिले बहुत विरक्ति हो और इसमें किसी समय राग बढ़ जाता है, किसी उत्तम वस्तु में जो लोक में ठीक माना जाता हो सुंदर तो उसको एक ख्याल आ जाता कि जहाँस्पष्ट घृणा होती है वहाँतो इसका निर्णय बड़ा ठीक ताजा रहता है कि ये सुख पाप के काम हैं, मगर जब राग की तीव्रता होती है तो लोक में मानी हुई कोई सुंदर वस्तु सामने हो तो जीव अपना परिणाम ढीला कर देता है। किसी भी स्थिति में हो, इंद्रियसुख दु:ख का ही काम है और हेय है।

इंद्रियजसुख की मोहदावानल के लिये महेंधनरूपता― जिनेश्वर देव ने बताया हे कि ये सुख मोहरूपी दावानल के लिए महान ईंधन हैं, जैसे जंगल में आग लग जाय तो वहाँईंधन की क्या कमी? आग वहाँबढ़ती है। आग बढने के लिए जैसे ईंधन होता है ऐसे ही मोह बढने के लिए ये इंद्रियविषयभोग हैं। उनमें यह ढंग नहीं रह सकता कि चलो एक बार अमुक विषय भोग लो फिर निपट गए, फिर भोगने का काम न रहेगा। चलो हमें कल दीक्षा लेना है, कल अमुक संन्यास लेना है तो आज खूब डटकर खा लिया फिर खाने का काम न रहेगा ऐसा ढंग यहाँ नहीं है, क्योंकि यह इंद्रियसुख भोग तो मोहरूपी दावाग्नि के लिए ईंधन है। ऐसा नहीं हो सकता कि चलो कल हमें दीक्षा लेना है, मुनि होना हे तो आज खूब पाप कर लें ताकि आगे जीवन में उन पापों का विचार न आये। यह कोर्इ ढंग नहीं है, यह कोई वश की बात नहीं है। उससे परिणामों में निर्मलता न आ सकेगी कि आज विषय इंद्रियसुख भोगा तो आगे फिर निपट जायगा। यह तो मोहरूपी दावाग्नि के लिए महान ईंधन की तरह है। जैसे जिसमें तृष्णा है तो परिग्रह का कितने ही बार वह परिणाम करता है किंतु जैसे ही उस परिणाम तक आ जाता है वैभव तो, आगे बढने लगता है। किया हुआ परिणाम भी छूट जाता है। उस समय तो लोग अधिक नहीं रखते मगर जब हो जाता हे तो यह बात भूल जाते हैं क्योंकि भीतर में तृष्णा है। तो विषय भोगों का मूल तो तृष्णा है और वहाँकोई ऐसा ढंग सोचे कि यह हमारा अंतिम इंद्रिय का उपभोग है, इसके बाद तो हमें त्याग करना है तो ऐसा जानकर स्वच्छंद होकर जो इंद्रियविषयों में लगता वह अपना उद्देश्य भी पूरा नहीं करता। यह विषय तो मोह दावाग्नि के लिए ईंधन जैसा काम करता है।

इंद्रियसुख की असातसंततिबीजरूपता― जिनेश्वर देव ने बताया हे कि यह इंद्रिय असाता की संतति का बीज है, याने दु:ख मिलता रहे, दु:खों की परिपाटी का एक बीज है, सो आप देख लो, सभी में यही बात है। स्पर्शनइंद्रिय के विषय के भोग में दु:खों की परंपरा बढ़ेगी, इस लोक में भी बढ़ेगी और परलोक में भी। इतना तो मोटे रूप से यहाँ ही दिखता है कि जो लोग आज परेशान हैं, अनेक लड़कियाँ हो गई उनकी चिंता है, अनेक लड़के हो गए, वे आपस में लड़ते हैं, उनका साधन बना रहे हैं, समझा रहे हैं, कितनी ही अड़चन हो जाती हैं तो लोग यह कह बैठते हैं कि अगर शादी न कराते तो इतना दु:खी न होना पड़ता। तो इससे यह बात सिद्ध है कि वर्तमान में जो दुखों की परिपाटी लग गई उसका मूल कारण है इंद्रियविषयों का भोग। रसना इंद्रिय की बात देखिये― रस की आसक्ति, रस का भोग, यह भी दु:ख की परिपाटी का कारण है, फिर भी लोग उसके लिए अनेक साधन जुटाते हैं, उसका क्लेश है, बीमार हो जायें, स्वास्थ्य बिगड़ जाय, ये भी दु:ख आते हैं और पापबंध होता है जिसके उदयकाल में आगे दु:ख भोगना पड़ेगा। यह भीबात बनती है, तो यह इंद्रियसुख असाता की संतति का बीज है, ऐसा जिनेश्वरदेव ने कहा है। तब क्या करना? ऐसा तत्त्वज्ञान बनायें, ऐसे अपने आपमें अंत: प्रकाशमान आनंदस्वरूप इस ज्ञानतत्त्व की दृष्टि बनावे कि यहाँ तृप्ति मिल सके, और ये विषयसुख सुगमता से छूट जायें ऐसा उपाय करना है।


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