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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1011

From जैनकोष



नरकस्यैव सोपानं पाथेयं वा तदध्वनि।

अपवर्गपुरद्वारकपाटयुगलं दृढम्।।1011।।

इंद्रियजसुख की नरकसोपानरूपता व नरकमार्गपाथेयरूपता―यह इंद्रियजंय सुख नरक का सोपान है, सोपान कहते हैंसीढ़ी को। यह न सोचें कि सीढ़ी सिर्फ चढ़ने के ही काम आते हैं, अरे सीढ़ी उतरने के काम में भी तो आती है। यहाँ तो जिस किसी बूढ़ेव्यक्ति के नाती, पोते, परपोते संते पंते आदि हो गए हों तो उसे बड़ा भाग्यशाली कहते हैं। जब वह मरता है तो उसके साथ कोई एक आधा या पाव तोले की सोने की सीढ़ी उसकी अर्थी के साथ में भेजते हैं इसलिए कि हमारे ये बाबाजी इस सीढ़ी से बड़ी आसानी से स्वर्ग में पहुँच जायें। पर जरा सोचो तो सही कि जिस बूढ़े ने नाती पोता, पनाती, आदि से खूब मोह किया हो वह मरकर स्वर्ग जायगा या नरक? तो बताओ वह सीढ़ी उसके स्वर्ग में चढ़ने के काम आयगी या नरक में उतरने के काम में आयगी? अरे वह तो उसके नरक में उतरने के ही काम आयगी। अब आगे कहते हैं कि यह इंद्रिय सुख नरकों में जाने के लिए कलेवा का काम करता है, जैसे यहाँ किसी को कहीं दूर की मुसाफिरी करना हो तो उसके लिए टिफिन बाक्स में नाश्ता (कलेवा) रख दिया जाता है, इसलिए कि रास्ते में कोर्इ बाधा न हो। ऐसे ही ये इंद्रियसुख इस जीव को नरक पहुँचने में कलेवा का काम करते हैं। तुम बड़ी जल्दी नरक में पहुँच जावो। तुम्हें वहाँ तक पहुँचे में कोई बाधा न आये, इसलिए ये इंद्रिय सुख मिले हैं।

इंद्रियजसुख की मोक्षद्वारदृढकपाटरूपता― यह इंद्रियसुख मोक्षनगर के द्वार का दृढ़ कपाटयुगल है। जैसे किसी महल में जाने के लिए कोई प्रयत्न करे और उसके दरवाजे में बड़े मजबूत किवाड़ लगे हों तो वह उस महल में प्रवेश नहीं कर सकता, इसी तरह मोक्षनगर में जाने के लिए ये इंद्रियसुख द्वार के किवाड़ हैं। यदि इन इंद्रियसुखों में लीन होंगे, आसक्ति होगी, राग होगा तो मोक्षमहल के अंदर प्रवेश नहीं हो सकता। एकीभावस्तोत्र में यह बताया है कि प्रभु भक्ति क्या है? ये मोक्ष के जो किवाड़ लगे हैं मोहमयी, उन किवाड़ों को खोलने की कुंजी है यह प्रभुभक्ति। इस प्रभुभक्ति का बड़ा महत्त्व है। जो लोग तत्त्वज्ञान में रुचि रखते हैं, तत्त्वज्ञान में अधिक समय लगाते हैं उनका अगर प्रभुभक्ति से सूना जीवन बीत गया तो उनका वह तत्त्वज्ञान सूखा रहेगा, उससे लाभ न मिलेगा। और प्रभुभक्ति में जब प्रभु का स्वरूप विचारा जाता है और अपना भी स्वरूप विचारा जाता और प्रभु की वर्तमान पर्याय विचारी जाती और अपनी वर्तमान पर्याय विचारी जाती तो ये सारे ध्यान जिस भक्ति में चल रहे हों वहाँ तो आनंद और विषाद का मिश्रण बनता है और भीतर-भीतर तो आल्हाद है प्रभुस्वरूप और अंतस्तत्त्व की तुलना में। और, विषाद क्यों है, उस वक्त गद्गद् वाणी का स्तवन होता है, और कभी आनंदाश्रु निकलते हैं कभी अपनी पर्याय और हीनता पर विषादाश्रु निकलते है पश्चाताप भी होता है, इसी प्रकार पछतावा में भी बड़ा गुण है, पछतावा में बड़ी निर्मलता जगती है। और श्वेतांबर संप्रदाय में तो कई कथानक ऐसे भी बताये कि पश्चाताप से केवलज्ञान हो गयाऔर मुक्ति हो गई। यद्यपि पश्चाताप केवल ज्ञान का कारण नहीं है लेकिन निर्मलता का कारण अवश्य है, परिणामों में विशुद्धि आयगी और उस विशुद्धि के कारण जो कुछ चाहिए केवलज्ञान के लिए, वह सब परिणाम से मिल जायगा। तो जहाँ पश्चाताप, भक्ति आदिक परिणाम बन जाते हैं वहाँमोक्ष के द्वार में लगे हुए कपाट खुल जाते हैं।किवाड़ों के खुलने की कुंजी है तो वहाँयह भी खोजना कि इंद्रियसुख मोक्षद्वार का प्रतिबंध करने वाले दृढ़कपाटयुगल हैं।


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