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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1016

From जैनकोष



विषस्य कालकूटस्य विषयाख्यस्य चांतरम्।

वदंति ज्ञाततत्त्वार्था मेरुसर्षपयोरिव।।1016।।

विषयविष की कालकूट से भी अगणितगुणी घातहेतुता―यहाँ विष और विषय दो चीजें सामने हैं। मोटे रूप से तो इनमें अंतर कुछ नहीं दिखता मगर इनका विश्लेषण करके देखिये तो बड़ा अंतर है। याने विष से विषय अधिक भयंकर है। दोनों में मेरु और सरसों के दाने बराबर अंतर बताया है। कालकूट विष तो है सरसों के दाने के समान और विषय है मेरु पर्वत समान भयंकर, इस विष (हलाहल) का कोई पान कर ले तो उसका मरण एक बार ही होता है, मगर विषयविष का पान कोई कर लेवे याने विषयों का लंपटी कोर्इ होवे तो उसे भव-भव में जन्ममरण के क्लेश सहने पड़ते हैं। तो अब यह बात ध्यान में लायें कि यहाँसे मरण करके यदि कीड़ामकौड़ा हो गए, पशु पक्षी कीट पतिंगा आदि हो गए तो फिर न जाने क्या हाल होगा? न जाने कितने दु:ख सहने होंगे। तो यह जन्ममरण की परंपरा इस जीव को विपत्ति में डालने वाली है। आज तो इस मनुष्यभव में हैं, पुण्य के साधन मिले हुए हैं, बड़ा मौज माना जा रहा है, वे कुछ अपने जन्ममरण की इस परंपरा का कुछ भय नहीं मान रहे, भय की बात तो तब आती है जब इन योनि जन्मों का ज्ञान हो। कैसे-कैसे कष्ट, कैसे-कैसे शरीर, जन्ममरण की बात सुनकर एक बार भय तो आता है, इस जन्ममरण से मुक्ति पाना चाहिए। पर उससे मुक्त होने का उपाय जब कहा जाय कि यह उपाय है कि आगे जन्म न हो, मायने हमें आगे शरीर न मिले, यह ही तो चाहिए ना। तो देखो यहाँ ही समझ लो कि मैं शरीर नहीं। शरीर से न्यारी सारी अन्य चीजें हैं। इस शरीर से मुझे मिलता क्या? वर्तमान में शरीर की चाह न रहे तो यह भी हो सकता कि आगे हमें शरीर न मिलें। अब यही शरीर की चाह बहुत-बहुत बना रहे हैं तो कैसे ऐसे हो कि आगे शरीर न मिले? वह तो उसकी परंपरा है। वह तो मिलेगा ही। तो जिसे शरीर की चाह न हो उसे शरीर में आदर न हो।जैसे कि लोग अपने शरीर को देखकर कहते कि मैं पुष्ट हूँ, तगड़ा हो गया हूँ। दर्पण से देखते हे कि मेरा चेहरा खूब साफ स्वच्छ है कि नहीं, अपने इस शरीर को ही यह मैं हूँ ऐसी धारणा बनाकर उसकी यश प्रतिष्ठा की चाह बनाये रहते हैं। शरीर को सफेद राख (पाउडर)लिपिस्टिक आदिक अनेक चीजों से खूब सजाते है तो यह सब क्या है? यह सब शरीर की चाह की घोतक है। नख बड़ा लेना, मेहंदी रचा लेना, सुंदर-सुंदर वस्त्राभूषण पहिनना, दिन में कई बार मेकअप करना, बार-बार साड़ियाँ बदलनाआदि ये सब क्या हैं? ये सब विपत्ति की चाह हैं। आत्मा की सुध की पात्रता भी नहीं है, ऐसी विपत्ति में पडा हुआ यह जीव जन्ममरण केघोर संकट सह रहा है। जिन्हें इस शरीर से छूटकारा पाना है उन्हें यह निर्णय रखना चाहिए कि यह शरीर अत्यंत गंदा है, इसको सजाने से क्या लाभ? यद्यपि स्थिति ऐसी हे कि इस शरीर की भी थोड़ी सेवा किए बिना काम नहीं चलता, वह तो एक स्थिति की बात है, सेवाकरनी पड़ती है, पर यह शरीर अहंकार किए जाने योग्य नहीं है। शरीर तो शरीर ही है। इस शरीर की चाह न रहे शरीर में पर्यायबुद्धि न रहे। इस शरीर से संबंधित विषयों की भी चाह न रखें। जो विषयों की चाह रख रहा उसे विषय शरीर मिलेंगे ही। आखिर यह भगवान प्रभु ही तो है। यह शरीर चाहेगा तो ये शरीर इसे खूब मिलते रहेंगे, क्योंकि आखिर यह भगवान ही तो है। यह इस समय बिगड़ा हुआ है, तो बिगड़ने पर भी इसका ऐश्वर्य कहाँजाय? इसका ऐश्वर्य यही है कि जो चाहे सो मिले। अब यह शरीर चाहता हे तो इसको शरीर मिलेंगे। जन्म मरण की परंपरा से निवृत्त होना हो तो पहिले यहाँ भेदविज्ञान करना होगा। भेदविज्ञानी पुरुष के विषयों की चाह की वृत्ति नहीं रहती। देखो यह विषयविष इस कालकूट विष से भी भयंकर उत्पात करने वाला है।


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