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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1018

From जैनकोष



इंद्रियाणि न गुप्तानि नाभ्यस्तश्चित्तनिर्जय:।

न निर्वेद: कुतो मित्र नात्मा दु:खेन भावित:।।1018।।

एवमेवापवर्गाय प्रवृत्तैर्ध्यानसाधने।

स्वमेव वंचितं मूढैर्लोकद्वयपथच्युतै:।।1019।।

इंद्रियविजय न करने की मूर्खता―अनेक मूर्ख ऐसे हैं कि जिन्होंने इंद्रियों को कभी वश नहीं किया। उन्हें मूर्ख कहा गया है जो इंद्रियों को वश नहीं करना चाहते। उनकी यह भावना ही नहीं है कि में इंद्रियों को वश करूँ। अब देखो― कहने की बात तो एक साधारणसी है। खूब खावो पियो, खूब रुचि से भोग भोगो, उससे क्या बिगाड़ है, और, और कामों में सुधार कर लो, लेकिन इन समस्त इंद्रियों के शेष जो चार इंद्रियाँहैं उन चारों इंद्रियों के स्वच्छ होने का मार्ग है यह कि मनमाने खूब रसीले आसक्ति से भोजन न करना। यह रस इंद्रिय की उद्दंडता कराने का एक साधन है इसलिए रसना इंद्रिय के विजय का बहुत उपदेश है ग्रंथों में। चरणानुयोग में बताया है कि भक्ष्य पदार्थ ही खावो, अभक्ष्य पदार्थ न खावो, रसों का परित्याग करो, खाने पीने में हर चीज में नियम रखो, प्रमाण रखो और कुछ गृहस्थ तो ऐसे भी पाये जाते हैं कि अगर उनके मन में आया कि हमें आज अमुक चीज खाने को मिलना चाहिए तो वे उसका त्याग कर देते हैं। जैसे मन खीर खाने का किया तो कहते कि बस मेरा तो आज खीर का त्याग। रसना इंद्रिय का विजय एक बहुत बड़ा महत्त्व रखता है। और, इससे फिर प्राय: सभी इंद्रियों का विजय आसानी से हो जाता है। कहते हैं कि वे पुरुष मूर्ख हैं जिन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में नहीं किया। उन्होंने अपनी एक शेर भी बना लिया है―‘‘जिन आलू भटा न खाये। वे काहे को जग में आये?’’ तो जो इंद्रियविजय की भावना नहीं रखते वे पुरुष मूर्ख हैं।

चित्तनिर्जय का अभ्यास न करने की मूर्खता― इस चित्त को जीतने का कभी इस जीव ने अभ्यास नहीं किया। देखो अपने घर की बात है, मिट्टी पत्थर के घर की बात नहीं कह रहे, अपने आपके अंदर की बात कह रहे, जहाँ बैठे हैं बस बैठे ही बैठे सोच लेना है, जरा भीतर ही भीतर अपने मन को नियंत्रित करके देखना है। इसमें और कुछ नहीं करनाहै।केवल मन को वश में करना है।मन को दंडित करना है। जैसे मन कहता है कि अमुक चीज खाने को मिलनी चाहिए तो वहाँ मन को ऐसा दंडित करना है कि वहाँ यह कह उठें कि बस मुझे तो उस चीज को नहीं खाना है जिसके खाने का मन किया। यों मन के उल्टा चलने लगें। यों मन जो-जो भी विषयसुख की वांछा करे बस उसके विरुद्ध हो जायें कि हमें ऐसा नहीं करना है। बस उससे बड़ा संतोष मिलेगा। इस चित्त के अनुसार चलने में जो मौज माना जा रहा वह संतोष भला नहीं है, वह तो कल्पना का मौज है। और उस चित्त को वश में कर लें और उससे उल्टा चलने का हम यत्न करें तो वह उल्टा सीधा ही कहलाता है, तो उसमें संतोषमूलक आनंद मिलता है। वे लोग मूर्ख हैं जिन्होंने अपने चित्त को वश में नहीं किया। मन में यह बात तो आनी चाहिए कि हमें इंद्रियविजय करना है।

रागपरिहार न करने की मूर्खता― वह पुरुष मूर्ख है जो कभी वैराग्य को प्राप्त नहीं होता। और देखो― किसी भी रूप में वैराग्य आये बिना सुख भी नहीं मिलता। यह जो संसार का इंद्रियजंयसुख है यह सुख भी किसी न किसी अंश में वैराग्य आये बिना मिलता नहीं है। जैसे खूब मनमाना भोजन किया। रसीला भोजन करते रहे तो आखिर कहाँ तक भोजन करेंगे? पेट तो जितना है उतना ही उसमें भरेगा। अब मनमाना खाने के बाद जो वह मौज मानता हे तो वह उस भोजन से निकला हुआ मौज (सुख) नहीं हैया उस विषयभोग का सुख नहीं है, किंतु खा चुकने के बाद खाने का राग न रहा, उस स्थिति का जरा सा आनंद आ गया। तो हमारे चौबीस घंटे के सुख में यह ही पद्धति हे कि राग नहीं रहा उसकासुख आया, मगर यह जीव ऐसा मान नहीं पाता। मानता यह हे कि इस चीज से सुख आया। चीजों को भोगने के समय में भी जो थोड़ा समय को जरा मौज सा आता है वह राग के अभाव का आता है। कितने ही किसी राग का अभाव हुआ हो, मगर यह ऐसा नहीं मान सकता। वह मानता हे कि मौज इस ही बाह्य पदार्थ से तो हुआ है। आपको किसी मित्र से मिलने की इच्छा हो रही, आप दु:खी हो रहे। आपको मित्र मिल गया तो आपको बड़ा आराम मिल गया। बताओ यह आराम मित्र के मिलने से मिला या मित्र से मिलने का काम अब नहीं रहा, उस भाव से हुई कृतार्थता से मिला? खोज करो। वह आराम मिला इससे कि अब मित्र से मिलने का काम नहीं रहा। जब तक चित्त में यह बात रहती है कि मेरे को करने को यह काम पड़ा है तब तक उसे आराम कहाँ? जब चित्त में करने का यह काम नहीं पड़ा है, मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञान ही करता हूँ। ज्ञान के सिवाय बाहर में मुझे कुछ काम करने को नहीं पडा, लो इस प्रतीति में उससे भी अधिक सुख में हो गए जो काम करके यहाँ भाव बना पाता था कि मेरे को अब काम नहीं रहा। वह सुखी तो यों न था कि एक काम को करने के बाद उस संबंधी भाव तो बन पाया कि मेरे को यह काम न रहा, मगर दूसरा काम चित्त में लाद लेते हैं कि मेरे को यह काम करने को पड़ा है तो वे तकलीफ पाते हैं। मगर तत्त्वज्ञानी को तकलीफ नहीं है, क्योंकि उसने आत्मप्रदेश से बाहर सर्वपदार्थों के संबंध से ऐसा निर्णय किया है कि मेरे करने को यहाँ कुछ भी नहीं पडा है। जिसने इस प्रकार की भावना ही नहीं की, परिणाम ही नहीं किया वह मूर्ख है।

मूर्खों को आत्मदु:ख भी यथार्थ दु:खरूप से अपरिचय― जिसने अपने आत्मा को कभी देखा ही नहीं, समझा ही नहीं, और विषयासक्त है, मोही है, वह मूर्ख है। जिसने संसार को दु:खमयी जान लिया और सांसारिक क्रियाओं में जिसने अपने को दु:खी समझ लिया, उसका तो दु:खों से छूटने का उपाय बनेगा ही। यह सारा लोक संसारी प्राणी दु:खों से छूटने का उपाय नहीं बना रहा है। इससे सिद्ध होता है कि लोगों ने अपने इस दु:ख को दु:ख ही नहीं समझा। दु:खी होते हुए भी दु:खी नहीं समझा। यह गुण भी है और दोष भी है। तत्त्वज्ञानी के लिए गुण है और मोही के लिए दोष है। ऐसा पुरुष जो मूर्खता तो लादे है और मोक्षप्राप्ति के लिए ध्यान साधना में प्रवृत्त हो रहा है, धर्म की धुन बनाये है तो उसने अपने आपको ठगा। जो विवेकी नहीं है और धर्म मानकर संतुष्ट हो गया है कि मैंने सब कुछ कर लिया, मैंने पूजन कर लिया, विधान कर लिया, में नौ कृतकृत्य हो गया, लो उसने क्या किया? अपने आपको ठगा। और, जिसने नहीं पाया वह यह, वह सोचता है कि में भी ऐसा बन जाऊँ तो फिर समझूँगा कि मैंने सब कुछ कर लिया, ऐसा जिसके विकल्प हुआ उसने भी अपने आपको ठगा। ऐसा पुरुष इहलोक और परलोक से भ्रष्ट होता है। इसमें यह प्रेरणा दी है कि तत्त्वज्ञान करो, विषयों से राग हटाओ और आत्मस्वरूप में मग्न होने की भावना करो।ज्ञानस्वरूप में ज्ञान को जोड़ दो, बस इससे ही सारी विपत्तियों का विनाश है। जैसे मछली पानी के भीतर किलोल कर रही है, आनंद मान रही है, वह पानी के बाहर हो जाय तो वह व्याकुल हो जाती है, इसी तरह जब तक इस ज्ञानस्वरूप में कोई मग्न है तब तक तो वह सुखी रहता है, आनंद में रहता है और जहाँ इस ज्ञानस्वरूप से वह बाहर हुआ कि बस विपत्ति में आ गया। तो एक ही निर्णय हो कि मोक्ष में ही आनंद है और मोक्ष प्राप्ति के लिए धर्म को साधना में आना है।


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