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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 104

From जैनकोष



गर्भादारभ्य नीयंते प्रतिक्षणमखंडितै:।

प्रयाणै: प्राणिनो मूढ कर्मणा यममंदिरम्।।104।।

संसारी जीवों का जन्म के अनंतर ही यममंदिर की ओर प्रयाण― हे पर्यायबुद्धि प्राणी ! देख यह आयु नाम का कर्म गर्भ से लेकर ही निरंतर प्रतिक्षण अपने प्रयाणों द्वारा यम की मूर्ति की तरह इस प्राणी को लिये जा रहा है, इसका तो विचार कर। यह जीव जब से गर्भ में आता है अर्थात् जन्म स्थान पर पहुँचता है तब से ही यह निरंतर प्रति समय मृत्यु की ओर जा रहा है। मरण दो प्रकार के होते हैं― एक आवीचि मरण और एक तद्भव मरण। जब से यह जीव नवीन भव में आया है तब से लो दो मिनट निकल गए तो इसका अर्थ है कि दो मिनट का मरण हो गया। प्रति समय यह जीव मरता जा रहा है। आयु के क्षय होने का नाम मरण है। आयु का प्रति समय उदय चलता है। तो जितने निषेकों का उदय आ रहा है उतने निषेक तो नष्ट ही हुए अर्थात् प्रति समय जो आयु का समय निकल रहा है, यह है आवीचिमरण और जब इन भवसंबंधी आयु के समस्त विपाक निकल जायें तो उसको कहते हैं तद्भवमरण। तद्भवमरण तो लोग जानते हैं कि यह जीव अब मर गया, पर आवीचिमरण की तरफ बिरले ही ज्ञानी पुरुषों का ध्यान रहता है। तो प्रति समय मरण हो रहा है। जिस नवीन भव की आयु मिली उस ही का नाम पूर्वभव का मरण है।

प्रतिक्षण मरण और हमारा कर्तव्य― जन्म और मरण इन दोनों का एक ही समय है। इसही प्रकार इस जीवन में प्रतिक्षण जो जीवन चल रहा है वह प्रतिक्षण का जीवन ही मरण है। अब जैसे यह उपदेश दिया जाय कि मरण के समय में समतापरिणाम करो, समाधिमरण करो, विषय कषाय मूर्छा का परिहार करो तो उसका भी तो यही अर्थ लो कि हम प्रति समय समतापरिणाम रखने का यत्न करें। क्योंकि हमारा मरण प्रति समय हो रहा है तब हम समाधि मरण भी प्रति समय बनाये रहें अर्थात् समतापूर्वक अपना जीवन बितायें। इस ही कल्याण की बात का ध्यान दिलाने के लिए इन शब्दों में कहा जा रहा है कि देख हे मूढ़ ! जब से तू गर्भ में आया है तब से तू निरंतर यमराज के महल की ओर जा रहा है अर्थात् मृत्यु के निकट पहुँच रहा है। पर सोचते तो यह हैं कि हम बड़े हैं, हमारी उमर इनसे बड़ी है, पर इसका ख्याल नहीं रखते कि इस प्रकार का काल्पनिक बड़ा-बड़ा बनाकर यह काल, यह व्यतीत हुई आयु हमें एक दिन बहुत ही निकट काल में इस भव से बिदा कर देगी, हमारा मरण हो जायेगा, यह काल हमें खा लेगा― इसका ध्यान नहीं है और बड़ा-बड़ा मानकर मोह में भूला फिरता है। अब हम इतने बड़े हो गये। यह जीव गर्भ से लेकर प्रतिक्षण यम अर्थात् मृत्यु क्षय की ओर ही जा रहा है, फिर तू यहाँ किसकी शरण ढूँढ़ता है?




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