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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 105

From जैनकोष



यदि दृष्ट: श्रुतो वास्ति यम ज्ञावंचको बलि।

तमाराध्य भज स्वास्थ्यं नैव चेत्कि वृथ श्रम:।।105।।

दुर्निवार यमाज्ञा― यदि तूने इस यम से भी बलवान् कोई पुरुष देखा हो जो यम की आज्ञा को भी भंग कर दे ऐसा देखा हो अथवा सुना हो तो हे प्राणी ! तू जा, अपनी ही शरण में रह, उसकी ही आराधना कर, क्योंकि अब यमराज से भी कोई बली पुरुष तुम्हें मिल गया है। लेकिन मिलता भी है कोई क्या? संसार में कोई जीव ऐसा है क्या कि जो मृत्यु से बाहर हो? नहीं है। हो कोर्इ यदि इस लोक में ऐसा जीव तो उसकी सेवा करो। है कोर्इ ऐसा क्या? हाँ है। जिसका अब कभी जन्म न होगा ऐसे जो सिद्ध भगवंत हैं, वे हैं यम से भी ज्यादा बलि। उन्हें कहते हैं कृतांतांतक। जिसने कृतांत का भी अंत कर दिया है, मृत्यु से भी, जन्म से भी जो परे हैं उनकी सेवा करो।

यमाज्ञा के लोप का यत्न― हे आत्मन् ! तू अपने ही स्वरूप में तो देख, तेरा सत्त्व मृत्यु से बलि है। मृत्यु तेरे सत्त्व को समाप्त नहीं कर सकती तब अपने आपमें सहज विराजमान् जो यह चैतन्यस्वरूप है इस चैतन्य-स्वरूप की उपासना कर। एक अपने आपके शरण को त्यागकर बाहर में कहीं भी शरण ढूँढ़ा तो ये तेरे परिश्रम व्यर्थ हैं। कोर्इ शरण नहीं मिलने का है। अशरण को शरण मान-मानकर अपने आपको धोखे में बनाये रखना, इससे तो बुरी दुर्गति होगी। बाहर में तू किसी को भी शरण मत समझ। एक अपने आपको यदि निर्विकल्प बना सकता है, मूर्छा से परे रख सकता है तो तेरे लिये तू ही शरण है। तू शरण मिल जायेगा? अन्यथा बाह्यदृष्टि से तो केवल दौड़ धूप ही है, श्रम ही है, वेदना ही है, क्षोभ ही क्षोभ है, खूब परख लो।

आत्महित का तंत्र― भैया ! इतना ही तो एक तंत्र है। जहाँ अन्य पदार्थों की ओर आकर्षण हुआ तो क्षोभ होने लगेगा। जहाँ अन्य पदार्थों की ओर आकर्षण न करके अपने सहजस्वरूप की निरख अथवा इस ही में घुलमिलकर अपने उपयोग को बनाया तो सारे झंझट समाप्त हो जाते हैं। किसी समय अपने आपकी ऐसी परिस्थिति बने तो सही, मिनट दो मिनट को भी। यदि सबको तू भूलकर अपने आपके इस ब्रह्मस्वरूप में निवास करता है, ऋषि संतों की आज्ञा मानता है तो कहीं इन दो चार मिनटों में ही घर न उजड़ जायेगा, परिजन भाग न जायेंगे। यदि तुझे इसमें शांति न मालूम पड़े तो घर तो पड़ा ही हुआ है। दिन रात उस ही में बसा रहे, पर एक बार इस उपाय का जैसा कि ऋषि संत बार-बार कह रहे हैं झलक तो लो, यत्न तो करो और कुछ अपने आपमें विश्राम पाने की परिणति तो बने। बाहर में कोई भी पुरुष ऐसा बलवान न मिलेगा जो यमराज की आज्ञा का भी भंग करने वाला हो।


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