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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1113

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असंक्लिष्टमविभ्रांतमविप्लुतमनाकुलम्।

स्ववशं च मन: कृत्वा वस्तुतत्त्वं निरूपय।।1113।।

मन को अनाकुल स्ववश करके ही वस्तुतत्त्व के अवलोकन की शक्यता:― हे आत्मन् ! अपने मन को वश कर ले, संक्लेशरहित कर ले, श्रमरहित बना ले, निराकुल कर ले और फिर वस्तु के स्वरूप को खूब निहारता रह। मन जब तक संक्लेश में रहता है तब तक यह मन वस्तुस्वरूप का अवलोकन नहीं करता। जब चित्त में भ्रमजाल लगे हुए हैं तो फिर वस्तुतत्त्व का निरूपण नहीं बनता। यहाँ निरूपण का अर्थ प्रतिपादन नहीं है किंतु अवलोकन है। भली-भाँति देखना। कोई बोले कि अमुक आदमी कहता है तो उसका भाव और है, अमुक आदमी निरूपण करता है उसका भाव और है। कहने में तो कहना ही है, वचन निकाल दिया और वह कहना एक रिकार्ड की तरह है। और निरूपण में कहने की भी मुख्यता नहीं। कहते हैं उसका अर्थ यह है निरूपण में कि समस्त वस्तुस्वरूप को अपने ज्ञान में ले रहा है, अवलोकन कर रहा है। तो जब मन स्थिर हो, किसी प्रकार का भ्रम नहीं, यथार्थ परिज्ञान है, निर्णय है, तब निराकुल बनता है और तब ही वस्तुत्व का निरूपण बनता है। सो हे आत्मन् ! एक अपने मन को वश कर ले और वस्तुस्वरूप के निरूपण का आनंद प्राप्त कर। वश भी चलता है अपने आप पर, दूसरे पर नहीं चलता। पड़ौसियों के बच्चे जब आपस में लड़ते है तो किसी को अगर बैर विरोध नहीं बढ़ाना है एकदम सब शांत कर देना है तो बुद्धिमान पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपने ही बच्चे को डाट दे, लो झगड़ा मिट गया, और अगर किसी दूसरे के बच्चे को डाटे, मारे पीटे तो झगड़ा और बढ़जाता है। तो वश चलता है अपने आप पर। यह एक दृष्टांत दिया है, बच्चा भी कुछ अपने आपका नहीं है।इसी प्रकार इस बड़े संग्राम के लिए वश करना चाहिए अपने आपके मन को। हम पदार्थों को जोड़जोड़कर सुखी बनाना चाहें, अपने को तो यह बात तो असंभव है और पदार्थों की हम इच्छा ही न करें ऐसा ज्ञान में अपने आपको ले जायें कि किसी पर की वांछा न रहे तो यह उपाय सुगम है, स्ववश है। परवस्तु को निरखकर चाहने की आदत में रोना मिट नहीं सकता, क्योंकि जो बात बनने की नहीं उसकी हठ से कुछ लाभ नहीं है। और यह सब हठ चूँकि लोग बड़े हैं और अक्ल वाले कहलाते हैं इसलिए बड़े नहीं मालूम पड़ते हैं। हम जो हठ करते हैं वह ठीक ढंग से सही कर रहे हैं यों लगता है, मगर हठ होती है परवस्तुवों में और वे सभी के हठ यों समझिये कि जैसे कोई बालक पहिले हाथी खरीदने का हठ करे कि मेरे लिए हाथी खरीद दो, और मान लो उसका पिता महावत से कह कर हाथी उसके पास खड़ा करवा दे। कुछ देर बाद वह बालक कहता है कि अब इस हाथी को मेरी जेब में भर दो। भला बतलावो इस काम को कौन कर दे? इस बात को सुनकर कुछ हँसी सी आती है। ऐसी ही हँसी के लायक हम आपके हठ हैं। जो-जो भी परिग्रह में बुद्धि देते हैं, परिग्रह का संचय करते हैं वे सब हठ उस बालक के हठ की तरह हैं, पर जहाँ सभी ऐसे ही विचार के लोग हों तो कौन किसका मजाक करे? सभी उसी तरह के हैं, पर जितने ये हट हैं ये सब हठ उपहास के योग्य हैं। तो उन सब बाह्य दृष्टियों को त्यागकर जो अपने मन को वश कर लेता है वही पुरुष वस्तु के स्वरूप का निरूपण करता है अर्थात् समग्र वस्तुवों को न्यारा-न्यारा निरखकर उपेक्षा करके अपने आपमें संतुष्ट रहा करता है और जब आत्मध्यान बनता है तब ही परमात्मस्वरूप का दर्शन होता है।


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