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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1114

From जैनकोष



रागाद्यभिहतं चेत: स्वतत्त्वविमुखं भवेत्।

तत: प्रच्यवते क्षिप्रं ज्ञानरत्नाद्रिमस्तकात्।।1114।।

रागाद्यभिहत मन की स्वतत्त्व विमुखता:― जो मन रागादिक विकारों से विपरीत है वह अपने आत्मतत्त्व से विमुख हो जाता है और फिर इस ही कारण मनुष्य ज्ञानरूपी रत्नमयरूपी पर्वत से च्युत हो जाते हैं। जिस चित्त में किसी भी बाह्यपदार्थ के प्रति राग बसा है ऐसा राग बसे हुए चित्त में आत्मा की बात नहीं समा सकती । जिस मन में रागादिक भाव रहते हैं उस मन में आत्मा की बात समा नहीं सकती। क्योंकि यह आत्मा एक उपयोग रूप है और जिस उपयोग में रागद्वेषमोह का विकार समाया हुआ हो उस चित्त में आत्मतत्त्व की बात नहीं आ सकती। यद्यपि संसार के प्राणी मात्र रागद्वेषमोह से दु:खी हैं। दु:ख का और कोई दूसरा कारण नहीं, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप में न्यारा-न्यारा बसा है। प्रत्येक जीव अपने आपके प्रदेश के अधिकारी हैं। कोई किसी का स्वामी नहीं है, कोई किसी को न सुखी कर सकता, न दु:ख कर सकता, न पापी बना सकता, न धर्मात्मा बना सकता। सबका अपना-अपना स्वरूप न्याराहै।पर अनंतानंत जीवों में से एक दो जीवों को समझ लिया कि यह मेरे हैं, बस उनके लिए जी जान सब एक कर देते हैं। जो लोग तन-मन-धन-वचन हैं वे सब इन्हीं दो चार प्राणियों के लिए हैंऔर उनके अतिरिक्त संसार के सारे प्राणियों को गैर मानते हैं। जिन्हें आज गैर मानते हैं वे ही जीव मर कर घर में आ जाये तो उनसे ही मोह करने लगेंगे। मोह करने की आदत है। तो एक विचारने की बात है, बनना तो जो है सो बनेगा। पर सच्चा ज्ञान आ जाय तो उसमें ही बड़ा चमत्कार बसा है, राग बनता है, ठीक है, घर में पड़ता है ठीक है, जो कुछ भी बीतती है, कषायों आती हैं, करते हैं ठीक है करना पड़ रहा है फिर भी यदि सही ज्ञान चित्त में बसा रहे तो उसकी बहुत सी बाधावों में अंतर आ जाता है। तो प्राणी एक अज्ञान में दु:खी है। राग भी हमारा दु:खदायी नहीं है जितना कि अज्ञान दु:खदायी है। एक बार 10 जुलाहा किसी बाजार में कपड़ा बेचने गए, बीच में पड़ती थी नदी। चले गए बाजार में। अब कपड़ा बेचकर घर में वापिस आने लगे तो जब नदी से निकले तो उस समय किसी ने कहा कि अपन 10 मित्र थे। जरा गिन तो ले कि 10 ही हैं या नहीं। जब गिनने बैठे तो जो गिनने वाला है उसने जो निगाह डाली तो उसे 9 मित्र दिखे। तो वह बोलता है कि भाई अपना एक मित्र तो कहीं गायब हो गया। उसका कुछ पता नहीं है कि कहाँ गया, क्या हुआ? जब दूसरे ने गिना तो उसे भी 9 ही मित्र दिखे। उसने भी अपने को न गिना। यों ही दसों ने गिन डाला, पर 9 ही मित्र निकले। अब वे दसों मित्र रोते हैं, माथा धुनते हैं कि हाय !क्या करें? गये तो थे दो चार रुपये के लाभ के लिए और अपना एक मित्र खो दिया। तो भला बतलावो वहाँ दु:ख किस बात का है? वह दु:ख है एक अज्ञान का, भ्रम का। हम 10 मित्र थे प्रथम तो यह अज्ञान बसा है और फिर उनमें से एक गायब हो गयादूसरा यह अज्ञान बसा है। वे केवल अज्ञान से दु:खी हो रहे हैं। इतने में कोईघुड़सवार वहाँ से निकला और इन सबको रोता हुआ, माथा धुनता हुआ देखा। पूछा भाई क्यों रो रहे हो? उन्होंने अपनी कहानी सुनाई। हम 10 मित्र थे। गए तो थे दो चार रुपये के लाभ के लिए पर अपना एक मित्र कहीं खो आये। उसने एक सरसरी निगाह में देखा तो 10 के 10 ही दिख गए। सो उसने कहा अच्छा अगर हम तुम्हारा 10 वां मित्र बता दें तो?...कहा― अगर हमारा 10 वां मित्र तुम बता दोगे तो हम तुम्हारा जिंदगी भर बहुत ऐहसान मानेंगे। जीवन भर आपके आभारी रहेंगे। तो उस घुड़सवारने उन दसों को एक लाइन से खड़ा किया और गिनता जाय― एक, दो, तीन, चार, पाँच, छ:, सात, आठ, नौ और जोर से बेंत मारकर कहे यह दस। यों ही उन दसों को गिन-गिनकर बताया जाय और दसवें को कुछ जोर से बेंत मारकर कहे कि यह दसवां तू ही तो है। तो जैसे अज्ञान से वे दु:खी हो रहे थेऐसे ही सारा क्लेश अज्ञान का है।

वैभव की विपत्तिरूपता:― ये तन, मन, धन कुछ भी साथ नहीं जाते। यह आत्मा ज्ञानरूप है, ज्ञानस्वरूप को ही लेकर जायगा। अब उसमें अज्ञान बसे, भ्रम रहे तो बस इतना ही दु:ख है। तो जिस चित्त में भ्रम बसा हुआ है, रागादिक भाव बसे हुए हैं वह आत्मतत्त्व से विमुख रहता है। इसी कारण मनुष्य ज्ञानरूप रत्नमय पर्वत से च्युत हो जाता है, ज्ञान से गिर जाता है। रागभाव विशेष आ जाय और उसका नियंत्रण न कर सकें, काबू से दूर हो जायें तो वह ज्ञानपर्वत से भी गिर जाता है। राग ही दु:ख देता है। जितना मौज में लोग रहते हैं, मेरे घर में सब कुछ है, परिवार अच्छा है, कुटुंब है। ऐसी जो अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं वे विपत्ति में हैं। प्रथम तो संयोग के काल में भी कोई लड़का कुछ कहना न मानता हो, आज्ञा न मानता हो, ऐसा जो बालक मौज में रह रहा है उसको वियोग के समय बहुत क्लेश होगा। इस कारण ज्ञानी गृहस्थ का कर्तव्य है कि संयोग के समय में भी ऐसा मानता रहे कि जितना भी ये संयोग हैं समागम हैं उनका अवश्य वियोग होगा। जिसका वियोग हो जाय उसका फिर संयोग हो या न हो कोई नियम नहीं है, पर जिसका संयोग हुआ है उसका वियोग जरूर होगा। यह पक्का नियम है। तो जो तत्त्वज्ञानी की दृष्टि रखे उसे क्लेश नहीं होता। यह सारा जगजाल मायारूप है, भिन्न है, सार का हित आत्मा नाम नहीं है किंतु उन पदार्थों में जब रागमोह चलता है तो यह प्राणी व्यर्थ दु:खी होता है और चाहने लगता है कि यह मनुष्य कि लोक में मेरी इज्जत तो हो। पोजीशन तो हो, मैं सबमें अधिक धनी कहलाऊँ, ऐसी स्थिति चाहते हैं। लेकिन किन लोगों में बड़ा कहलवाना चाहते हैं? ये सब दु:खी जीव हैं, कर्मों के प्रेरे हैं, जन्म मरण के चक्र में लगे हुए हैं, विनाशीक हैं। ये सब मर मिटेंगे, जिनमें हम कुछ अपनापन रखना चाहते हैं। देखिये जिनमें अपना बड़प्पन बताना चाहते वे तो गुजर जायेंगे और व्यर्थ ही इस अज्ञान के भाव करने में जो पाप लगा है उसका दु:ख भोगना पड़ेगा।


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