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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1115

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रागद्वेषभ्रमाभावे मुक्तिमार्गे स्थिरीभवेत्।

संयमी जंमकांतारसंक्रमक्लेशशंकित:।।1115।।

राग, द्वेष, भ्रम का अभाव होने पर मुक्तिमार्ग में स्थिरता:― इस संसाररूपी वन में भ्रमण के क्लेशों से भयभीत हुए संयमी मुनीश्वर रागद्वेष मोह के अभाव से ही मोक्षमार्ग में स्थिर हैं। सबकी एक ही पद्धति है, जो राग करेगा सो दु:खी होगा। जो राग छोड़ेगा वह सुखी होगा। सुखी होने की भी बात क्या, आत्मा तो स्वयं आनंदस्वरूप है। जैसे हम इन चौकी तखत वगैरह को देखते हैं ना तो इनका स्वरूप कौन समझता है? क्या स्वरूप है? जैसे यह पिंड है, कड़ा है, रूप आदिक है, यह तो इसका स्वरूप है। और जरा आत्मा के स्वरूप की बात सोचिये। मेरे आत्मा का स्वरूप क्या है? इस आत्मा में काला, नीला, पीला आदिक कोई रूप भी है क्या? रूप नहीं है, खट्टा, मीठा आदिक इसमें कोई रस भी नहीं है। इसी प्रकार गंध और स्पर्श भी नहीं है। फिर है क्या आत्मा? आत्मा है ज्ञान और आनंद। अमूर्त चीज है आत्मा। केवल ज्ञान और आनंद इसमें विदित होगा। जो अपने आपमें मैं सुखी हूँ में शांत हूँअथवा दु:खी हूँयों भी अनुभव करता हो वही तो आत्मा है। आनंद का जब विपरीत परिणमन होता है तो वह दु:ख है, क्लेश है और जब विशुद्ध स्वभाविक परिणमन होता है तो उसका नाम सुख है, आनंद है। तो आत्मा में ज्ञान और आनंद ही स्वरूप नजर आयगा। अपने आपको बराबर इस रूप में निहारें, ऐसी भावना भायें कि मैं ज्ञानमात्र हूँ, आनंदस्वरूप हूँ, मैं स्वयं ज्ञानमात्र हूँ, स्वयं आनंदस्वरूप हूँ, मैं ज्ञान और आनंद से स्वत: परिपूर्ण हूँ। मुझे ज्ञान अथवा आनंद प्रकट करने के लिए कुछ नई चीज नहीं जोड़नी है। केवल ज्ञान और आनंद का जो विघात हो रहा था रागद्वेष भाव के कारण इन रागद्वेष विकारों को दूर करना है। इतना भर काम है करने का। जैसे कोई कहे कि धर्म करो तो धर्म करो का क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ इतना ही है कि तुम अपने आत्मा का सही ज्ञान कर लो और चूँकि इस आत्मा में अन्य कोई वस्तु नहीं है, अतएव सबका रागभाव छोड दें।यथार्थ ज्ञान करना और रागद्वेष मोह छोड़ना यही धर्म का पालन है। यह बात बने तो समझिये कि धर्म किया। प्रभुभक्ति दर्शन आदिक करके भी यदि रंच भी मोह राग में फर्क नहीं आया तो क्या यह कहा जा सकता हे कि उसने धर्म किया? रागद्वेष मोह दूर हो, अपने आत्मा का आनंद अपने अनुभव में आये तो उसका नाम हे धर्मपालन। धर्मपालन किसी पर ऐहसान करने के लिए नहीं किया जाता। मैं धर्म करता हूँ तो मैं समाज पर कुछ ऐहसान रखता हूँ ऐसी बात नहीं है। मैं धर्म करता हूँ तो अपने लिए, अपनी शांति के लिए। मेरा प्रभाव मुझमें ही होगा। धर्मपालन जो करे सो शांति का मार्ग पाता है। तो जो मुनीश्वर रागादिक भाव से दूर होते हैंवे ही मोक्षमार्ग में स्थिरता से रहते हैं। रागद्वेष मोह के दूर किए बिना मुक्ति का मार्ग नहीं मिलता। जरा रागद्वेष मोह हो रहे हैं तो खूब करें, कमी न रखें, पर अंत में मिलेगा क्या? केवल कष्ट। सब अनुभव करके देख लो। प्रभु का मार्ग पाया, जैन शासन पाया तो कुछ तो ऐसा विचार करना चाहिए कि सामायिक में, दर्शन में कि हे प्रभो ! मैं मोह राग द्वेष भावों से ही दु:खी हूँ, मुझे दु:खी करने वाला अन्य कोई नहीं है। मेरा यह मोह राग कैसे छूटे? उस ही उपाय में मेरी भलाई है और अन्य कुछ भी सार की बात इस जगत में नहीं है ऐसा विचार तो आना चाहिये, यह सब अपनी भलाई के लिए है, ऐसा ही जो करते हैं उनके गुरुराज कहो, मुनिराज कहो, साधु कहो, वे सब आत्मा की साधना कर लेते हैं और सदा के लिए संकटों से मुक्त हो जाते हैं।


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