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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1116

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रागादिभिरविश्रांतं वंच्यमानं मुहुर्मन:।

न पश्यति परं ज्योति: पुण्यपापेंधनानलम्।।1116।।

रागादिक से ठगाये गये मन का अंधत्व:― यह मन रागादिक से निरंतर वंचित हुआ पुण्य पाप रूपी ईंधन का अग्नि के समान ऐसी परमज्योति का अवलोकन नहीं कर सकते। आत्मा के ज्ञानस्वरूप का अवलोकन कोई कर ले तो पुण्य पाप ईंधन की तरह भस्म हो जाते हैं। एक अपने आपके स्वरूप की सम्हाल में सारे संकट दूर हो जाते हैं। कभी भी कोई विपदा आ रही हो, चिंता सताती हो उस समय एक अपनी स्वरूपदृष्टि करने का ही प्रयत्न बनायें फिर कहाँहै क्लेश? मान लो एक ख्याल बन गया अमुक चीज में कोई तीस हजार का मुनाफा हुआ, थी किसी भाव की कोई चीज और उसका भाव बढ़कर कुछ और हो गया, लो खुश हो रहे हैं, और अगर भाव गिर गया तो ख्याल बनाकर उसमें हानि समझकर दु:खी हो जाते हैं। लेकिन तत्त्वज्ञान से सोचिये तो जरा कि मेरे आत्मा में क्या हानि हुई है? यह तो बाहरी मल है, रहा न रहा, उससे इस आत्मा का क्या सुधार बिगाड़ है? आत्मा का सुधार बिगाड़तो आत्मा के सम्यक्चारित्र और मिथ्याचारित्र से है। बाह्य पदार्थों की हानि से कमी रहने से हमारा कोई बिगाड़ नहीं है। ज्ञान को जरा सम्हाल लें बस सुखी के सुखी हैं। इन रागादिकों से तो अपना सारा नुकसान ही नुकसान है। मोह में ज्यादा नुकसान महसूस होता है। तो जब तत्त्वज्ञान के विपरीत हमारी वृत्ति चलती है तो कितनी ही बाह्य स्थितियाँहो वहाँ अपने सुख का अनुभव नहीं कर सकते। और सच तो यह हे कि अपने आप पर दया आ जाय और कभी किसी क्षण तो यों निरखिये कि मैं अकिंचन हूँ, मेरा कुछ भी नहीं है, मेरा तो मात्र मैं ही हूँ। जब देह तक भी मैं नहीं हूँतो अन्य की चर्चा ही क्या करें? मेरा तो मात्र मैं ही हूँ। जब मोह का तीव्र उदय होता है तो मेरा मैं भी नहीं रह पाता। किसे परिचय है कि मैं आत्मा क्या हूँ। शरणभूत तो वास्तव में आत्मा का यह आत्मा ही है। तो जब अपने को अकिंचन अनुभव करें, मेरा कहीं कुछ नहीं है। मैं केवल ज्ञान और आनंदस्वरूप हूँ, इस अकिंचन भावना में सर्वसंकटों के मेटने की शक्ति बसी है। प्रभु को हम पूजते हैंतो क्या है प्रभु के पास? न धन-संपदा है, न घर-बार है, न कुटुंब-कबीला है। क्या है प्रभु के पास? समवशरण में विराजमान प्रभु के देख लो। सिद्ध लोक में विराजे प्रभु को देख लो। वे अकिंचन हैं, उनके तो देह तक भी नहीं है। उनके ध्यान में ही इतना बड़ा चमत्कार है कि जो प्रभु का निष्कपट ध्यान करते हैं वे सर्व कुछ संपदा शांति प्राप्त कर लेते हैं।

दृष्टांतपूर्वक तुंग अकिंचन से समृद्धिलाभ की सिद्धि:―पहाड़ अकिंचन है। पहाड़ पर न पानी है, न पहाड़ पर कोई समुद्र है फिर भी सारी नदियाँ पहाड़ से ही निकलती हैं। और समुद्र में अथाह पानी भरा होता है लेकिन समुद्र में से कभी कोई नदी नहीं निकलती। समुद्र तो नदियाँ और चाहता है तो समुद्र में जल अथाह भरा है, वहाँ से कोई नदी नहीं निकलती और पर्वत में जल का एक बूंद भी नहीं है फिर भी सारी नदियाँपर्वत से ही निकलती हैं। तो जो अकिंचन हैं प्रभु, उनकी उपासना में जो बात मिल सकती है वह अकिंचन श्रीमान आदिक से नहीं मिल सकती। इसलिए अपने आपको अकिंचनरूप ही सोचना चाहिए। मेरा मेरे सिवाय कहीं कुछ नहीं है। चित्त में जो बाह्य बातें बसायी जाती हैं वैभव की, दूकान की, नाते रिश्तेदारों की उनसे यह चित्त बड़ा ओझल बन जाता है। तो किसी भी समय ऐसा भी विचार करें कि मेरा कहीं कुछ है ही नहीं। किस बात पर क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक कषायें करूँ और किस प्रयोजन के लिए तृष्णा और लालच बढाऊँ। यहाँ है क्या? मैं तो अकिंचन हूँ, केवल ज्ञान और आनंदस्वरूप हूँ। यों अपने को अकिंचन निरखियेगा। यह भी एक धर्म है, जिसके प्रताप से परमात्मपद प्राप्त होता है। दशलक्षण धर्म में एक अकिंचन धर्म भी है। जो अपने को अकिंचन अनुभव करेगा वह उत्कृष्ट पद पायगा। व्यवहार में भी जो अपने को न कुछ बताता है उसकी कितनी बड़ी इज्जत बन जाती है और जो अपने को अपने मुख से कहे तो उसे फिर कुछ इज्जत नहीं मिलती। तो यह प्रभु जो अकिंचन हैं उनका अकिंचनपना जाहिर होने से उनकी कितनी बड़ी इज्जत है। हम आप भी अपने आत्मा में यदि अकिंचन की भावना बनायें तो हम आपको भी परमात्मपद प्राप्त हो जाय इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तो यह अकिंचन की भावना अपने चित्त में भाना चाहिए और किसी क्षण ऐसा अनुभव करें कि मैं सबसे न्यारा केवल ज्ञान और आनंद स्वरूप मात्र हूँ, इस तरह का अपना ध्यान बनायें यही धर्मपालन है, यही सर्वसंकटों के मिटाने का सुगम उपाय है। तो अपने को रागादिकरहित केवल ज्ञानस्वरूप अनुभव करने में कुछ समय जरूर बिताना चाहिए। चाहे किसी भी जगह हो। किसी भी समय हो, ऐसा अनुभव करने में ज्ञानप्रकाश मिलेगा और आकुलता भी रहेगी।


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