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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1117

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रागादिकपंकविश्लेषात्प्रसन्ने चित्तवारिणि।

परिस्फुरति नि:शेषं मुनेर्वस्तुकदंबकं।।1117।।

रागादिकपंकविश्लेष से प्रसन्न चित्तवारि में पदार्थपरिस्फुरण:― जैसे जो जल कीचड़ से रहित है तो वह प्रसन्न है अर्थात् निर्मल है। उस प्रसन्न जल से जैसे पदार्थ झलकता है, प्रतिभास होता है इसी प्रकार जब रागद्वेष मोह पंक न रहे तब यह चित्त प्रसन्न रहता है, निर्मल रहता है। चित्त मायने ज्ञान। ज्ञान निर्मल रहता है तो उसमें समस्त वस्तुसमूह प्रतिबिंबित होते हैं। ज्ञान स्वभाव से जाननशील है, अतएव इस ज्ञान का सारे विश्व के साथ ज्ञेयज्ञायक संबंध है अर्थात् सारा विश्व जानन में आ जाय। ज्ञान की यह शैली नहीं है कि सामने पदार्थ हो तब जाने। जैसे कि इस समय हम आपको ऐसा लगता है कि सामने वस्तु हो तब ही तो जानन बनेगा पर यह ज्ञान की शैली नहीं है। यह एक रुकावट और आवरण की परिस्थितियों में बात बनी है। जैसे कोई बहुत बड़ा पुरुष भी किसी विपत्ति में फँस जाय तो उसे भी एक किसी बात पर समझौता करना पड़ता है निरपराध होकर भी। ऐसे ही ज्ञान का जाननस्वरूप तो ऐसा है कि ज्ञान ज्ञान के कारण सबको जान लेगा, जहाँ भी जो सत् हो। जैसे इंद्रिय में तो ऐसा लगता है कि सामने वस्तु हो, संसर्ग में आयी हो तो ज्ञान होने पर मन इंद्रिय से विलक्षण शैली से जानता है, सामने नहीं है नियत भी कुछ नहीं है कि मन किसी विषय को जाने और मन क्षणभर में कहीं की भी जान ले, कितना ही पहिले की जान ले, कितना ही बाद की जाने। क्षोभ रहे यह बात अलग है पर मन में एक शैली है, मन भी एक मलिन विकार है, उससे भी उत्तम शैली होना चाहिये विशुद्ध ज्ञान की। तो ज्ञान में स्वयं ऐसी शैली हे कि वह सब सत् को जाने। जब उसमें आवरण होता है तब नहीं होता ज्ञान। जब आवरण मिटा तो ज्ञान में प्रसन्नता जगे। निर्मलता जगे तो वहाँ अनेक वस्तुवों का समूह स्पष्ट रूप से स्फुयरायमान होता है।

रागद्वेषमोहपरिहार का शिक्षण:― इस प्रकरण में रागद्वेष मोह भाव को टालने के लिएशिक्षा दी गई है। इन्हें टालो तो तुम भले ही हो, परिपूर्ण तो हो ही। स्वरूप में स्वभाव में निर्मल हो, उत्कृष्ट हो, एक विकार को टाल दें तो वही निर्मलता पूर्ण बन जाती है। और ये विकार व्यर्थ के विकार हैं। कुछ कल्पनाएँ जगी लो विकार बन गए। उन कल्पनावों से सारतत्त्व क्या निकला? उन कल्पनाओं के द्वारा चीज क्या हाथ आयी? चीज हाथ आना तो दूर रहा, खोया ही है सब कुछ। जितना समय गुजरा उतने में रोया ही है, पाया कुछ नहीं। तो ये रागद्वेष मोह हटने के लिए ही हैं ऐसा पूर्ण निर्णय होना चाहिए। ज्ञानी गृहस्थ का ऐसा परिपूर्ण निश्चय रहता है।ये रागद्वेष मोह हटाये ही जाना चाहिए। इनको रखना न चाहिए। कैसा ही राग हो पर राग की एक कड़िका भी इस जीव के लिए हित करने वाली नहीं है। ये परिचय, ये आराम, ये भोग सब क्या है? सब जीव की बरबादी के कारणभूत हैं। जो इन्हें चाहते हैं, उनके ही बीच में रहते हैं सो इन सब बातों के होने से हम भी उन्नति समझते हैं। हमने इतने महल बनवा लिया, ऐसी दूकान बना ली, इतना वैभव संचित कर लिया, इतने राज्यों में लोक में हमारी पहुँच हो गयी, हमारी मान्यता हो गयी। सब लेखा जोखा लगा लो। हो क्या रहा? इस आत्मा में शांति क्या मिली? इन सबकी ओर से उत्तर यह होगा कि इतने भी क्या काम करें, सब बेकार हैं। देखिये किए बिना गुजारा भी नहीं है गृहस्थी में और उदासी उनमें रखे बिना कल्याण नहीं है। ऐसी स्थिति है। कोई गृहस्थ हो ऐसा तो बतावो कि ऐसी उपेक्षा रखता हो कि न घर में किवाड़ रखे, न साँकर रखे, न व्यवस्था बनाये, न दूकान करे, न कमाये। बस हमारा तो भगवान शरण है खूब ध्यान में लगे, न व्यवस्था बनाये न घर की सोचे। है क्या कोई गृहस्थ ऐसा? गृहस्थी में ऐसा नहीं बनता। काम वे ही करता पर एक भीतर के उजेले का सब फर्क है, इसी कारण तो कहते हैं कि सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि गृहस्थ की बाहरी बातें सब एक सी मालूम पड़ती हैं, पर भीतरी प्रकाश का अंतर है। एक को शांति के मार्ग का पता ही नहीं है, आत्मा के स्वरूप का भान ही नहीं है, विपत्ति आने पर घबड़ायेगा, और एक ऐसा ज्ञानी है कि जिसे शांति के मार्ग का पता है और यह भी जान रहा हे कि हम जो काम कर रहे हैं वे अशांति के काम हैं, मेरे करने के काम नहीं हैं। उसे आत्मा का भान है यह स्वरूप है तभी वह विपत्ति के आने पर घबड़ाता नहीं क्योंकि उसका जो परमशरण है निजधाम वह उसको मिल चुका है, उसे विह्वलता नहीं होती। कुछ भी बनो। तो जब रागद्वेष मोह का पंक अलग हो जाता तो यह ज्ञान अथवा चित्त इतना प्रसन्न होता कि इस निर्मल चित्तरूपी जल में समस्त वस्तुवों का समूह स्पष्ट स्फुयरायमान होता है। यह ही ध्यान का फल है। ध्यान उत्तम बनने से क्या-क्या बातें आती हैं वही बात इसमें कही गई है।


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