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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1118

From जैनकोष



स कोऽपि परमानंदो वीतरागस्य जायते।

येन लोकत्रयैश्वर्यमप्यचिंत्यं तृणायते।।1118।।

वीतराग पुरुष के उत्पन्न हुए परमानंद के समक्ष लोकत्रयैश्वर्य की तृणवत् तुच्छता:―जो वीतराग होता है, रागद्वेष मोह से उपेक्षा रखता है उस पुरुष के ऐसा कोई परम आनंद प्रकट होता हे कि जिसके द्वारा तीन लोक का भी ऐश्वर्य जो कि अचिंत्य भी है, महान् भी है ऋण के समान हो जाता है। जिसे जो चीज न चाहिए उसके लिए तो वह तृणवत् है।बड़े छोटे बालक को ये महल, मकान, ऐश्वर्य, वैभव क्या हैं कुछ नहीं हैं। तृणवत् हैं, उसकी चाह ही नहीं है, ऐसे ही किसी ज्ञानी योगी पुरुष को ये समस्त वैभव क्या हैं? तृणवत् हैं। और गृहस्थ को भी प्रतीति में तृणवत् लग रहा है। उस वैभव की सम्हाल कर रहा है इतने पर भी उसकी दृष्टि में सारे लोक का ऐश्वर्य तृणवत् है। जैसे कोई पुरुष मर रहा हो, शरीर छोड़कर जा रहा हो और उससे कहें कि लो यह 10-20 तोला सोना की सांकल पहिन लो तो उसे वह सांकल सुहाती है क्या? जिसे फाँसी काहुक्म दिया जाय उसे कोई पूछे कि तुम्हें क्या खाना है? जो खावोगे वह खिलायेंगे। लड्डू, पेड़ा, रसगुल्ले जो चाहो सो बतावो। तो उसका दिल इस बात को सुनकर खुश होता है क्या? उसे तो कुछ नहीं सुहाता। ऐसे ही जिसे पता हो कि मेरे आत्मा की तो यह गति हो रही है संसार में। अभी मनुष्य है, समय आयगा तो कहीं के कहीं चले जायेंगे, यहाँ कोई किसी का नहीं है, सब उसे झंझट मालूम पड़ रहा है। तो उसे ये सारे वैभव तृण की तरह लग रहे हैं। तो जिसका राग बीत गया है ऐसे प्राणी को कोई ऐसा अलौकिक परम आनंद प्राप्त होता है कि जिससे तीन लोक का भी महान ऐश्वर्य तृण के समान लगता है। एक जीर्ण शीर्ण तिनका कोई कोट या कमीज में लगा है तो क्या कोई उसे लगा रहने देता है? उसे तो वह झट फेंक देता है। तत्त्वज्ञानी के चित्त में उसकी कुछ कदर नहीं है। इस वैभव की कदर से मेरे को क्या मिलेगा? न मेरे को आनंद मिलेगा, न गुणविकास होगा, न पवित्रता होगी, न जन्ममरण की विपत्ति टलेगी। कुछ भी तो नहीं है। ज्ञानी को यह सारा ऐश्वर्य तृण के समान लगता है। कंचन कांच एक बराबर जिसकी दृष्टि में हैं वह दृष्टि क्या है? सबसे न्यारे अपने आत्मा के आनंद का अनुभव कर लिया है इसलिए दृष्टि सन्मुख हो गयी है, बदल गयी है, जैसी दृष्टि पहिले थी पर की ओरलगी हुई उससे विरुद्ध हो गयी है, अब उसे कंचन कांच एक समान लग रहे हैं। एक निर्णय यह हो जाय कि दुनिया में हमें अपना नाम करके बड़प्पन करके अपने को कुछ बतला करके क्या करनाहै? हमें क्या लाभ मिलेगा ये लोग जानते ही नहीं। जैसे किसी आदमी की कोई पूछ न हो और वह जान जानकर तुरैया सी छौके। ऐसी ही सबकी हालत है। कोई किसी को जानता है नहीं, सब एक मायारूप हालत है, पर यह जीव सबमें अपने को आगे करना चाहे, बड़प्पन चाहे, यश चाहे, ये अज्ञान की स्थितियाँहैं उसी का ही सारा क्लेश है। यह महान अंधकार है। तो बड़प्पन की चाह मिटे तो ये बातें बन सकती हैं जो एक शांति चाहने वाले को चाहिए।


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