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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1122

From जैनकोष



रागौ बध्नाति कर्माणि वीतरागो विमुच्यते।

जीवो जिनोपदेशोऽयं समासाद्बंधमोक्षयो:।।1122।।

बंध और मोक्ष के कारणों का संक्षेप में निरूपण:―जैन शासन में बंध और मोक्ष का उपाय संक्षेप में यह बताया है कि जो रागी पुरुष हे वह तो कर्मों से बंधता है और जो वीतराग है वह कर्मों से छूटता है। और यह एक सारभूत उपदेश है― लाख बात की बात यही एक निश्चय में लेना है कि हमको जितने भी क्लेश होते हैं वे रागभाव से हुआ करते हैं। किसी न किसी परपदार्थ में रागभाव हे तब क्लेश है। खूब खोज करें तो क्लेशों का कारण और कुछ दूसरा न मिलेगा। जितना भी बंधन है वह सब राग का बंधन है। कोई गृहस्थ कहता हो कि हम घर से बहुत विकट बंध गए हैं। छोटे-छोटे बालक हैं, उनका बंधन हमें है पर बंधन न बालकों की ओरसे है, न किसी इष्ट की ओरसे है।बंधन हे तो केवल अपने रागभाव का। जितने भी जीव को बंधन हैं वे उनके स्नेहभाव जगने के कारण हैं। एक गाय का छोटा बच्चा उस बच्चे को कोई गोद में उठाकर आगे चले तो गाय बछड़े के पीछे ही भागती है। गाय को रस्सी से ले जाने की जरूरत नहीं है। उसके बछड़े तो आगे ले जावे कोई तो वह अपने आप चलती जायगी। तो इतनी बड़ी गाय और एक दो दिन का वह बछड़ा, क्या उस बछड़े ने गाय को बाँध लिया? अरे वह गाय स्वयं स्नेहवश उस बछड़े से बंध गयी। ऐसा ही सब जीवों का समाचार है। किसी भी जीव को किसी परपदार्थ ने बांधा नहीं है। स्वयं स्नेह किया और उस स्नेह के कारण बंध जाता है। जो जीव राग करेगा वह कर्मों को बाँधेगा और जो राग से दूर होगा वह कर्मों से मुक्त हो जायगा। यह ही बंधन और मोक्ष का एक संक्षिप्त मर्म है। जो शरीर में राग करता है उसको शरीर का बंधन बराबर मिलता चला जायगा। एक शरीर छोड़ा तो दूसरा शरीर मिलेगा। दो शरीर की परंपरा बराबर बनती चली जायगी और जिसे शरीर से राग नहीं है, शरीर से भिन्न आत्मतत्त्व में जिसे आत्मप्रतीति है वह शरीर से मुक्त हो जाता है। केवल अपने आपके भावों का ही बंधन है और अपने आपके भावों से ही मुक्ति है।


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