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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1123

From जैनकोष



तदि्ववेच्य ध्रुवं धीर ज्ञानार्कालोकमाश्रय।

विशुष्यति च यं प्राप्य रागकल्लोलमालिनौ।।1123।।

रागविलय के अर्थ ज्ञानसूर्यप्रकाश के आश्रयण का अनुरोध:― हे धीर वीर पुरुष ! ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश का आश्रय कर। इस ही ज्ञानभाव के आश्रय से भव्य पुरुष रागभाव से मुक्त हो जाते हैं। इस आत्मा को कुछ तो चाहिए जिसमें कि यह लगे। जैसा आत्मा का स्वभाव श्रद्धान् है अपने किसी भी तत्त्व में हित का भाव बना जिसे यह श्रद्धान् है और किसी न किसी पदार्थ का ज्ञान करते रहना यह स्वभाव है, इसी तरह आत्मा का यह भी स्वभाव है कि किसी न किसी भाव में लगे रहना। अब यदि इस आत्मा को अपना ज्ञानस्वभाव दृष्टि में मिलता है तो वह वहाँ लगेगा और अपना ज्ञानस्वभाव अपनी दृष्टि में नहीं रहता है तो वह किसी पर की ओरलगेगा। जैसे श्रद्धान आत्मस्वभाव है, ज्ञान आत्मस्वभाव है इसी प्रकार किसी न किसी भाव में लगना यही हुआ चारित्र। यह भी आत्मस्वभाव है। तो जो अज्ञानी पुरुष हैं, रागी पुरुष हैं उन्हें अपने आत्मा का तो परिचय नहीं है अतएव वहाँ नहीं लगते और बाह्य पदार्थों का उन्हें परिचय पड़ा हुआ है तो वे बाह्य पदार्थों में लगा करते हैं। लेकिन जो अपने ज्ञानस्वभाव से परिचित हैं, उनका लगाव ज्ञानस्वभाव से है और इस ही कारण राग की नदी उनकी सूख जाती है, अर्थात् रागभाव नहीं रह पाता। राग मिटा कि सारे संकट मिट गए। सारे संकट क्याहैं? एक रागमात्र ही है। प्रथम तो शरीर में राग किए हुए फिर रहे हैं। इसी का बोझ लादे फिर रहे हैं। बूढ़ाभी शरीर हो गया, इतने पर भी क्या ममता छूटती है? अपने शरीर से तगड़ा रूपवान अनेक मनुष्यों का शरीर है, मगर दूसरे के शरीर में किसी को ममता नहीं जगती है। उसको माने कि यह में हूँ ऐसा भाव होता हे क्या? कैसा ही देह हो अब इस ही देह में ममता और आत्मीयता जगा करती है तो प्रथम तो इस शरीर से ही राग है अतएव शरीर के पोषण के लिए शरीर के विषयंद्रिय साधना के लिए निरंतर कल्पनायें बनाया करते हैं। करता कुछ नहीं आत्मा। न हाथ पैर हैं, न मूर्ति स्वरूप है, न किसी को परख सकता है और पकड़ा नहीं तो छोड़ेगा भी किसे? यह एक भेद-भाव बना रहता है। उस भाव में यदि वह पराश्रित है तो कर्मों से बंध जाता है और यदि स्वाश्रित भाव हैतो कर्मों से छूट जाता है।


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