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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1144

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साम्यसूर्यां शुभिर्भिन्ने रागादितिमिरोत्करे।

प्रपश्यति यमी स्वस्मिन्स्वरूपं परमात्मन:।।1144।।

संयमी मुनि संभावरूपी सूर्य की किरणों से रागादिक तिमिर समूह के नष्ट होने पर परमात्मा का स्वरूप अपने आपमें अवलोकन करता है। परमात्मा का स्वरूप अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति और अनंत आनंदमय है। प्रभु वीतराग हैं, विज्ञान से भरे हैं। इन्होंने मोहरूपी अंधकार को ऐसा नष्ट कर दिया जैसे सूर्य की प्रचंड किरणों से अंधकार दूर हो जाया करता है। यह अनंत चतुष्टय के धनी हैं, समस्त गुण इनके विकसित हैं, समस्त दोष इनके ध्वस्त हो चुके हैं। आत्मा ही परम उत्कृष्ट निर्मल अवस्था है, उससे बढ़कर और आदर्श क्या हो सकता है? निर्दोष, निराकुल, आनंदमय एक स्थिति है परमात्मा की। उससे और उत्कृष्ट बात क्या होगी? उसका स्वरूप स्मरण आते ही अपने आपके स्वरूप का भान होता है और बाह्य की तृष्णायें आकुलताएँदूर होती हैं, स्वयं स्वयं में मग्न होता है। तो जो मुनि स्वभावरूपी सूर्य की किरणों से रागसमूह को नष्ट कर लेता है वह परमात्मस्वरूप को अपने आपमें देखता है। विषय और कषायों का ओट है जिससे प्रभु का दर्शन नहीं होता। यह ओट दूर हुई कि इसे परमात्मतत्त्व का दर्शन होने लगता है। मैं स्वयं पूर्ण हूँ, सब कुछ हूँ, अधूरा नहीं हूँ, अपने आपका जो सहज ज्ञानस्वरूप है वह अनुभव में आये फिर संकट का कोई काम नहीं रहता।


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