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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1145

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सांयसीमानमालंब्य कृत्वात्मन्यात्मनिश्चयम्।

पृथक् करोति विज्ञानी संश्लिष्टे जीवकर्मणी।।1145।।

भेदविज्ञानी पुरुष समता भाव की सीमा का आलंबन करके अपने में ही अपने आत्मा का निश्चय करके मिले हुए और कर्मों को पृथक्-पृथक् कर देता है। देखिये कोई दो वस्तुवें साथ-साथ में हों, संयोग में हों तो उन्हें पृथक्-पृथक् करा देने वाली सीमा होती है। जैसे दो खेत पास-पास में हैं तो यह एक खेत है, यह दूसरा है ऐसा ज्ञान कराने के लिए उसमें मेड़ बना होता है, हद होती है, इसी प्रकार जीव और कर्म ये दो मिले हुए हैं, इन दो को हम अलग-अलग कर सकें वह है समता भाव। यों निश्चय करिये कि जहाँ तक साम्यभाव है वहाँ तक तो वह जीव भाव है और जहाँसाम्यभाव नहीं है वह सब कर्मभाव हैं। इसको यों निरखिये जैसे कि समयसार में कहा हे कि जीव क्या है? जीव केवल एक विशुद्ध चित्स्वभाव है। उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि नहीं हैं, कषाय भी नहीं हैं, संयमस्थान भी नहीं है। यहाँ तक बताया कि उसमें आध्यात्मस्थान भी नहीं है, वहाँ कोई डिग्रियाँनहीं हैं। तो यह जीव क्या है? एक शुद्ध चित्स्वरूप। वह है क्या? एक समता भाव का पूरा साम्यभाव। तो समझ लीजिए कि जितना चित्स्वभाव है वह तो है जीव और उसके अतिरिक्त जो भी विभाव परिणतियाँहैं वे तक भी जीव नहीं हैं। तो साम्य की उसमें सीमा है, या यों कह लीजिए कि चैतन्यभाव की एक सीमा है। जितना चैतन्यस्वरूप है वह तो है जीव और उसके अतिरिक्त जो भी विभाव हैं, परभाव हैं वे हैं सब अजीव। तो भेदविज्ञानी पुरुष समता भाव की सीमा का आलंबन करके अपने में ही अपने आत्मा का निश्चय करें और जीव और कर्म को पृथक् करें। चित्स्वभाव के अतिरिक्त अन्य जो कुछ परिणतियाँहैं वे सब कर्म कहलाती हैं। यहाँ कर्म को पौद्गलिक कर्मरूप से न देखकर किंतु आत्मा के द्वारा जो किया जाता है वह कर्म है, अर्थात् विभाव परिणमन सब कर्म हैं। वे हैं सब अजीव। यों जीव और अजीव में भेदविज्ञान किया जाता है। यों यह तत्त्वज्ञानी जीव मिले हुए जीव और कर्मों को इस प्रकार विभक्त कर देता है और यों विभाग करके फिर करता क्याहै कि जीव से उपेक्षा करके चित्स्वभाव रूप जो जीवतत्त्व है उस जीवतत्त्व में दृष्टि बनाना और उस ही में स्थिर होना यह संसार के संकटों से छूटने का उपायहै। यों जो समतापरिणाम का अनुभवन करता है उसके आत्मा का विशुद्ध ध्यान बना और विशुद्ध ध्यान के प्रताप से आत्मीय यह अनंत निधि प्राप्त हो जाती है। उस ही ध्यान के लिए समतापरिणाम का प्रयोग करना यह उपदेश में कहा गया है। मोह रागद्वेष ये ही दु:ख की खान हैं। इन्हें जहाँतजा वहाँ सारे संकट दूर हो गए, यों समझना चाहिए।


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