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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1157

From जैनकोष



तस्यैवाविचलं सौख्यं तस्यैव पदमव्ययम्।

तस्यैव बंधविश्लेष: समत्वं यस्य योगिन:।।1157।।

जिस योगी पुरुष में समतापरिणाम जगता हैउस योगीश्वर के ही अविचल सौख्य उत्पन्न होता है। ऐसा आनंद जिसका कभी वियोग न हो। वह आनंद उस योगी के प्राप्त होता है जिसने आत्मा का ध्यान करके पवित्र अपने उपयोग को बना लिया है, उसी के अविनाशी पद प्रकट होता है। ये संसार के जो कुछ समागम हैं वे सब कर्मानुसार हैं। जब जो काम नहीं होना है उसके लिए पुरुष यदि तीव्र वांछा करे, अधिक मेहनत करे, श्रम करे तब भी नहीं होता। तो इससे क्या शिक्षा मिलती है कि आत्मा के अनुभव का काम मात्र आत्मा के निकट रहने से होता है। बाह्य पदार्थों के संचय से समता प्रकट नहीं होती है। सर्व आनंद समतापरिणाम में ही है। लोक में उसका बहुत आदर होता है जो रागद्वेष नहीं करता, जो किसी का पक्षपात नहीं करता, अपने आप उसमें समता, गंभीरता, धीरता रहती है उस पुरुष के यहाँ ही बड़ी आस्था होती है। तो अविचल आनंद रस ही योगी के हैं और अविनाशी पद भी उस ही योगीश्वर के हैं। भव-भव के बाँधे हुए कर्मबंधों का विनाश उस ही योगी के है जिस योगी ने समतापरिणाम की साधना कर ली है।


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