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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1158

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यस्य हेयं न चोदयं जगद्विश्वं चराचरम्।

स्यात्तस्यैव मुने: साक्षाच्छुभाशुभमलक्षय:।।1158।।

जिस मुनि के चराचर रूप समस्त जगत में न कोई हेय रहा, न कोई उपादेय रहा, उस मुनि के ही शुभ अशुभ कर्मरूपी मलों का शीघ्र क्षय हो जाता है। स्वरूपदृष्टि से भी देखो तो आत्मा अमूर्त है, वह किसी भी पदार्थ को पकड़ नहीं सकता। जब किसी पदार्थ को आत्मा ग्रहण नहीं करता तो फिर उसने त्यागा ही क्या? त्याग भी क्या चीज रही? आत्मा तो सकलंक है ही नहीं। तो जो कुछ ग्रहण करने को नहीं तो त्यागने को भी क्या है? जीव अपने भाव ही तो ग्रहण करता और भावों का ही परित्याग करना। तो जो इतना समतापरिणाम में आ गया कि जिसको न कुछ हेय है, न कुछ उपादेय है उस ही मुनि के शुभ और अशुभ कर्मों का शीघ्र विनाश होता है। समता की बड़ी महिमा है। यहाँ ही समता रहे तो लोक के अनेक संकट टलते हैं और फिर मोक्षमार्ग में इस समता से ही पहुँचा जा सकता है। समता बिना मोक्षमार्ग कभी नहीं बनता। तो उस समतापरिणाम का आदर योगीश्वर करते हैं जिनके प्रताप से ऐसा उत्कृष्ट ध्यान बनता कि भव-भव के कर्म ध्वस्त हो जाते हैं। जाप, व्रत, तप, विधान आदि से यही शिक्षा लें कि मेरे विषयकषाय दूर हों और हम अपने आपको ज्ञानस्वरूप अनुभव करते रहें।


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