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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1167

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यस्यांतकरणे बिभर्ति कलया नोत्कृष्टतामीषद―

व्यार्यास्तं परमोपशांतपदवीमारूढमाचक्षते।।1167।।

जिस योगी के मन में वन से नगर, शत्रु से मित्र, पत्थर से स्वर्ण, रस्सी या सर्प से पुष्पजाल, पाषाण शिला से चंद्र समान उज्ज्वल शय्या आदिक पदार्थ अंत:करण में किंचित मात्र भी भले, उत्कृष्ट, बड़े नहीं दिखतेउस ही मुनि को सत् पुरुष यह कहते हैं कि यह मुनि उपशांत पदवी को प्राप्त हुआ है। जो वन से नगर में आराम की चीजें हैं। वन में तो कष्ट है, कहाँबैठना, उठना, सोना, कितना भयानक जंगल है, इसमें क्रूर जंतु रहते हैं। नगर बड़े आराम की जगह है, ठंड गर्मी का बचाव है, सारे साधन निकट हैं यों जिनके मन में नहीं आता और वन से नगर को उत्कृष्ट नहीं मानते, दोनों को एक प्रकार समान समझते हैं और कदाचित् नगर से वन को अच्छा समझते हैं ऐसे ही मुनि उपशांत भाव को प्राप्त होते हैं। देखिये जीव पर सबसे बड़ी विपदा है विकल्पों की, आत्महित के मंच पर यह बात कही जा रही है। इस समय यह कुछ ध्यान न देना कि वाह परिवार का खर्च कैसे चलेगा, उसकी बात नहीं कही जा रही, यह तो आत्महित का जो एक मार्ग है उसकी बात कही जा रही है। उसे गृहस्थ थोड़ा धारण कर पाते, योगी पूर्ण धारण कर पाते, और फिर यह भी एक निर्णय है कि गृहस्थी का पालन कोई एक पुरुष नहीं कर रहा, बल्कि कमाने वाले से अधिक पुण्य घर के उन लोगों का है जो बैठे रहते, मौज करते और काम वाले से ज्यादा भोगोपभोग भोगते हैं। कमाने वाला कहाँशान से रह पाता, सादा खाना, सादा रहना, सादे कपड़े पहिनना, यही रहता है, खुद को ढंग से नहीं रख सकते। जब व्यापार आदिक में लग रहे हैं तो वही जो कुछ मिल गया खा लिया, कमाने वाला शौक शान से कहाँरहता है? और जो घर के लोग स्त्री पुत्र वगैरह हैं वे कितना शान से मौज से रहते हैं। अब जरा यह बतावो कि उस कमाने वाले का पुण्य अच्छा है या घर में रहने वालों का पुण्य अच्छा है? पुण्य तो घर में रहने वाले उन चार जीवों का ही अच्छा है जिन्हें कमाना नहीं पड़ता, श्रम नहीं करना पड़ता। यह एक दिल पलटने के लिए बात कही जा रही है।यथार्थ क्या है इसको कोई तराजू से तौलकर नहीं कहा जा रहा है, पर जो मोटे रूप से देखने में बात आयी वह कही जा रही है। ऐसा जानकर में किसी को पालता पोषता हूँ इस अहंकार को छोड देना चाहिए। केवल इस शिक्षा के लिए बात कहा है। हम किसी को कमाकर खिलाते है ऐसा कहना सही नहीं है। इसे यों बोलिये कि जिनके काम में यह संपदा आ रही है उनके पुण्य के उदय से कमाई में निमित्त बन रहा हैं। कर्तृत्वबुद्धि की भाषा में आप अपने को न निरखिये। ये मुनिजन वन से नगर को उत्कृष्ट नहीं मानते, शत्रु से मित्र को उत्कृष्ट नहीं मानते, अर्थात् दोनों ही एक समान जीव हैं। दोनों के ज्ञाता द्रष्टा रहते हैं। यह बात गृहस्थी में होना तो जरा मुश्किल है, पर जो केवल आत्मकल्याण पर ही तुल गया है वह तो वही कार्य करेगा जिसमें आत्महित हो, कल्याण में बाधा न आये, और वह उपाय है समता का। वह शत्रु और मित्र को एक समान समझता है। पत्थर पड़ा है और स्वर्ण पड़ा है, पत्थर से स्वर्ण को उत्कृष्ट नहीं मानते। देखिये आशय की बात है― चाहे यह जान रहा हैवह कि यह डला तो एक दो आने का है और यह डला लाख रुपये का है, है तो है मगर खुद के लिए तो दोनों एक समान हैं। लोहे से स्वर्ण की उत्कृष्टता नहीं देता। ऐसे योगीश्वर परम शांत दशा को प्राप्त होते हैं। रस्सी या सर्प है और एक ओरफूलों की माला है तो रस्सी से फूल माला में उत्कृष्टता न देंगे। दोनों ही पदार्थ हैं, यह भी है, रस्सी भी है, सर्प भी है।जिनको केवल आत्महित की धुन लग गयी उनको इन बाह्य बातों में यह उत्कृष्ट है ऐसा ख्याल नहीं जगता है, उसके लिए तो सब समान हैं। जिन्होंने बाह्य वस्तुवों से अपना हित नहीं माना, लगाव तोड़ दिया उसके लिए तो वे सब बराबर हैं। पाषाणशिला और एक शय्या में उनके लिए कोई भेद नहीं है। पाषाणशिला के आगे वे कोमल शय्या की उत्कृष्टता नहीं मानते। अच्छा यह तो मुनियों की बात है। जब कभी गृहस्थ को कोई बड़ी ठोकर लगती है जिससे फिर संसार में उसे और कुछ नहीं सूझता है उस तक को भी पलंग और शय्या नहीं रुचते हैं। पड़ा रहता है जमीन पर, जमीन से शय्या को वह उत्कृष्ट नहीं मानता, क्योंकि उसके चित्त में एक बहुत बड़ी चोट लगी है, उसी ओरख्याल है, शरीर के आराम के साधनों पर दृष्टि नहीं है। जब यहाँ तक मूढ़पुरुष की बात बन जाती तो भला जो एक सहज ज्ञायक स्वरूप है, जो आत्मतत्त्व की धुन में है उसे तो परमार्थ पंथ दिखता है, वह यह भाव न करेगा कि शय्या अच्छी है और पाषाणशिला जघन्य है। तो जिसका चित्त इन बाह्य वस्तुवों से मुग्ध नहीं होता ऐसे योगीश्वर ही परमशांत दशा को प्राप्त होते हैं। उनके उत्कृष्ट ध्यान जगता है जिसके प्रताप से सदा के लिए संकटों का विनाश कर लेता है।

सौद्योत्यंगे श्मशाने स्तुतिशयनविद्यौ कर्दमे कुंकुमे वा,पल्यंके कष्टकाग्रे दृषदि शशिमणौ चर्मचीनांसुकेषु।


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