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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1168

From जैनकोष



शीर्णांके दिव्यनार्यामसमशमवशाद्यस्य चित्तं विकल्पै―

र्नालौढं साऽयमेक: कलयपि कुशल: साम्यलीलाबिलासम्।।1168।।

जिन योगियों का मन लोकव्यवहारियों द्वारा माने गए इष्ट और अनिष्ट पदार्थों में विकल्पित नहीं होता वे ही योगीश्वर समता की लीला के विलास का अनुभव करते हैं।इस समतापरिणाम की वृत्ति की लीला का वे ही आनंद पाते हैं जिन योगियों का मन शिखर में श्मशान में और बड़े-बड़े महलों में और मरघट में यह विकल्प नहीं मचाते कि हमें महल में इष्ट है और मरघट में अनिष्ट है। जिसके जिस बात की लगन होती है उसे तो वह चाहिए। योगी को आत्मा के स्वरूप के दर्शन करने की और उस ही ज्ञान में मग्न होने का आनंद लूटने की धुन लगी है। वह बात जिनके नहीं प्रकट हुई उनका कैसे चित्त लगेगा? यदि विकल्प उठे तो श्मशान की उत्कृष्टता देंगे, महल की उत्कृष्टता न देंगे और फिर ऊँची बात तो यह है कि महल और श्मशान में दोनों में समता रहे। जिस पुरुष के दोनों में समता रह सकती है, उसकी परख यह हे कि वह रहा करे मरघट में, जंगल में, एकांत में, यों कहने से बात नहीं बनती। शास्त्र में तो कुछ दुहाई देते कि योगीश्वरों को क्या है, महल और जंगल एक समान हैं। महल में रहें तो क्या, जंगल में रहें तो क्या? हम महलों में रह रहे हैं तो समान दृष्टि करके रह रहे हैं यह बात जमती नहीं है। ऐसे समतापरिणाम वालों की वृत्ति एकाकी वन में, श्मशान में ऐसे-ऐसे स्थानों में रहने की है। कदाचित् रहना भी पड़े नगरों में भी तो जहाँतक संभव है कुछ ध्यान योग्य, धार्मिक वातावरण योग्य कोई एकांत स्थान का बने तो वहाँ भी रहते हैं किंतु उनका चित्त संतुष्ट नहीं होता। जिनको ज्ञानस्वरूप के अनुभवन में लालसा है, ज्ञान-ज्ञान के स्वरूप को जानता रहे बस यही तो अनुभव की स्थिति है। ऐसी स्थिति की जिन्हें धन है उन पुरुषों का मन निर्जन स्थान में लग पाता है। खैर रहें वे मरघट में, जंगल में तब भी कहा यह जायगा कि उनकी दोनों में समान बुद्धि है। लौकिक जन महलों की शिखर पसंद करते हैं उनके मुकाबले में कुछ समता की बात कही जायगी, और कदाचित् यह भी कह दें कि उनको महल अनिष्ट है और श्मशान जंगल, वन ये इष्ट हैं और इससे ऊँची स्थिति बनने पर उनके श्मशान, वन की सुध नहीं रहती है। ऐसी निर्विकल्प स्थिति बनती है, एक समता कह दीजिए तो बात बहुत उपयुक्त है।

जिस योगी का चित्त निज सहज शुद्ध ज्ञायकस्वभाव काअनुभवन उमड़ा है वह स्तुति में और निंदा में अपने मन को विकल्पित नहीं करता। कितना विशिष्ट आत्मबल है कि कोई निंदा भी कर रहा है किंतु वह अपने विशुद्ध ज्ञानस्वरूप को निरख रहा है इसके निकट ही रहकर तृप्त हो रहा है और उसके लिए यह बात स्पष्ट है। जैसे कहीं बाहर के दृश्य देख रहे हैं― वह देखो अमुक पहाड़ से, अमुक जगह से नदी निकली, अमुक जगह वह नदी गिरी तो इस बात के जानने में क्या विकल्प? ऐसे ही ज्ञानी पुरुषों को कोई उनकी निंदा करे अथवा प्रशंसा करे तो उससे उनको क्या विकल्प? निंदक और प्रशंसक दोनों ही उनकी दृष्टि में समान है। न निंदा करने वाले पर विरोध का भाव लाते हैं और न प्रशंसा करने वाले पर स्नेह का भाव लाते हैं, ऐसा ही योगियों के समतापरिणाम का जो विशुद्ध फल है, आत्मीय आनंद है ऐसे अमृत का पान किया करते हैं। ये योगीश्वर कीचड़ में और केसर में समान बुद्धि रखते हैं। लोग मानते हैं ना कि केसर कीमती चीज है और बड़े-बड़े उपचारों में काम आती है और केसर भी तो एक तरह का कीचड़ सा बन जाता है। उसे पानी में घोले इसलिए केसर के साथ मुकाबले में कीचड़ रख दिया। उनकी केसर और कीचड़ में समान वृद्धि रहती है। समतापरिणाम के अभ्यासी योगीश्वर शय्या और काँटे के अग्रभाग के कटीली जमीन में अथवा काँटायुक्त पृथ्वी में समानता बर्तते हैं। जब तक मूल बात समझ में न आयगी तब तक यह विश्वास न हो पायगा कि उन योगीश्वरों को शय्या और जमीन या जो-जो और बातें अभी कही गई हैं उनमें समतापरिणाम रहता है।

जैसे बंध्या स्त्री प्रसव करने वाली स्त्री का क्या ज्ञान कर सकती है?वह तो यों ही समझती होगी कि यह इतरा रही है। जो तकलीफ प्रसव के समय में मिलती है उसको बंध्या स्त्री क्या अनुभव कर सकती है? ऐसे ही मोहीजन जिनकी जगत के समागमों में इष्ट अनिष्ट की बुद्धि लग रही है वे ज्ञानी की इस अंतरवृत्ति को क्या समझ सकें कि उनको श्मशान और महल एक समान नजर आते हैं? अंदाजा करने वाले की उसके अनुरूप कुछ परख हो, कुछ ज्ञानदृष्टि हो तो बड़े की वृत्ति का भी अंदाजा कर सकते हैं, पर मोह में, तद्विषयक ज्ञान रंच भी नहींहोता और न वैराग्य की जरा सी उमंग भी होती। तो ज्ञानियों की चर्चा का वह अंदाजा नहीं कर सकता। ये योगीश्वर पत्थर में और चंद्रकांतमणि में लोह और रत्न में समतापरिणाम रखते हैं। विकल्पों से स्पर्शित नहीं हैं। चित्त उनका विकल्पित नहीं होता। उन्हें रत्न की वांछा हो तो विकल्प हों। कुछ चाहिए ही नहीं उन्हें। केवल एक ही अभिलाषा है। मेरा यह ज्ञानस्वरूप प्रभु मेरी दृष्टि में अधिकाधिक रहा करे। जैसी चाह है उसके अनुकूल ही चेष्टा होगी। अब अंदाजा कर लीजिए चक्रवर्ती 6 खंड के वैभव का स्वामी और किसे कहा जाय? चक्रवर्ती का वैभव तो भौतिकता की दृष्टि से बड़ा है और तीर्थंकर का वैभव इज्जत की दृष्टि से बड़ा है, इसके वैभव से बढ़कर किसका बताया जाय, पर ये चक्री और तीर्थंकर भी इस वैभव से तृप्त नहीं हुए। इसे त्यागकर एक विशुद्ध ज्ञायकस्वभाव के दर्शन में उन्हें तृप्ति बनी। तब आप समझिये कि इस स्वाधीन निज सहज स्वभाव के अनुभवन की कीमत कितनी है? तीन लोकों की सारी संपदा से भी बढ़कर उनमें उपमा के लिए कुछ है ही नहीं दुनिया में। इतना महान वैभव है ज्ञानानुभूति। इसकी जिसे उमंग है वह रत्न को क्या रत्न समझेगा? वह यों यही समझेगा कि यह रत्न भी उन रूप,रस, गंध, स्पर्श आदि के पाषाणों की तरह है। ऐसे समतापरिणाम वाले योगीश्वर ही आत्मीय सत्य आनंदामृत का पान करते हैं। ये योगीश्वर चर्म में औरचीन देश के बने रेशम में तथा अनेक प्रकार के और-और आवरणों में किसी भी प्रकार का विकल्प नहीं किया करते हैं। इसी से उनके किसी को भी ग्रहण करने का भाव नहीं है, फिर भी मुकाबले की दो चार चीजें बताकर समता की बात कही जा रही है। इन योगीश्वरों के चित्त में क्षीण शरीर उनमें, सुंदर स्त्री आदिक का रूप इनमें भी मन विकल्पित नहीं होता है। देखिये दृष्टि के अनुसार वासना वृत्तियाँ चलती हैं। जिनको निज शुद्ध ज्ञानस्वरूप के अनुभव में उमंग जगी है उसे इसके अतिरिक्त जो ये सब कुछ विषय साधन हों अथवा रूप हों ये सब नि:सार जँचते हैं। जैसे जब चित्त नहीं रहता है घर के किसी पुरुष में तो उसका आकार फिर सरस नहीं जँचता, क्योंकि खुद में उससे राग हटा हुआ है ना, ऐसे ही इन योगीश्वरों को अपने ज्ञानानुभव में उमंग है अतएव ये सब शरीर अपवित्र असार धोखा भरे जँचते हैं। तो उन योगीश्वरों के क्षीण शरीर में जिनके न रूप रहा, न मुद्रा रही और जो हष्ट–पुष्ट सुंदर शरीर हैं उनमें मन विकल्पों से स्पर्शित नहीं होता। ऐसे प्रवीण मुनि समतापरिणाम में लीला के विनाश का अनुभव करते हैं। देखिये जो बात इन योगीश्वरों के लिए कही जा रही है उनके आचरण पूर्ण अथवा अधिकाधिक आ रही है। लेकिन वे सब बातें ज्ञानी सद्गृहस्थ के भी किसी अंश तक आना चाहिए और प्रतीति में, श्रद्धा में तो इतनी ही दृढता होनी चाहिए जितनी कि योगिराजों को है। कल्याण का मार्ग एक ही प्रकार का है और वह यही है पर से विमुख होना और अपने आत्मा में उन्मुख होना। ऐसे योगीश्वर अतुल्य शांति प्राप्त करते हैंऔर समतापरिणाम की लीला का विलास किया करते हैं।


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