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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1192

From जैनकोष



आर्तरौद्रविकल्पेन दुर्ध्यानं देहिनां द्विधा।

द्विधा प्रशस्तमप्युक्तं धर्मशुक्लविकल्पत:।।1192।।

यह ध्यान का मुख्यतया ग्रंथ है, तो इस परिच्छेद से पहिले-पहिले सब ध्यान की योग्यता बन सके वैसा वर्णन आया है। बारह भावनाओं का स्वरूप कहा, ध्यान, ध्याता, ध्येय, फल सबका विवरण बनाया और जैसे वैराग्य जगे, काम विकार नष्ट हो, कषायें दूर हों, उस प्रकार का चिंतन कराया और फिर उनके उपाय में समतापरिणाम मुख्य है, वह जैसे बन सके उस प्रकार ज्ञान और वैराग्य का उपदेश दिया। सब कुछ बहुत-बहुत वर्णन करने के बाद, ध्यान के अंग का भी विचारविनिमय करने के बाद अब ध्यान का सीधा वर्णन किया जा रहा है। ध्यान 2 प्रकार के बताये― एक शुभ ध्यान और एक असत् ध्यान। असत् ध्यान तो दो प्रकार का है― आर्तध्यान और रौद्रध्यान। आर्तध्यान में तो पीड़ा होती है, रौद्र ध्यान में यह जीव मौज मनाता है। कोई इष्ट पुरुष का वियोग हो गया, अब उसका ध्यान बनाये हुए हैं―यह कब मिले? कैसे मिले? यह इष्ट वियोगज आर्तध्यान अनिष्ट विचार का संयोजक हुआ करता है। किसी अनिष्ट विचार से अनिष्टवियोगज आर्तध्यान होता है। इन दोनों ध्यानों में जीव को पीड़ा हुआ करती है। इष्ट का वियोग हुआ तो वहाँ भी कष्ट होता है, अनिष्ट का संयोग होता है तो वहाँ भी कष्ट होता है। तीसरा आर्तध्यान है वेदनाप्रभव। शरीर में कोई वेदना हुई तो उसमें ध्यान बनाये हुए हैं कि हाय अब क्या होगा? क्या यह वेदना बढ़ जायगी? क्या मरण हो जायगा? यों इस शरीर की वेदना के संबंध में ध्यान बनता है वह सब आर्तध्यान है। चौथा आर्तध्यान है निदान का। किसी बात की आशा रखना इस भव के लिए अथवा परभव के लिए, अमुक पदार्थ मुझे मिले, उसकी आशा बनाये तो आशा के भाव में भी तो पीड़ा होती है। अभी यहीं आप किसी की बाट जोह रहे हों, कुछ देर हो गयी, वह न आया तो आप झट झुंझला जाते है। तो आशा करके जो वेदना होती है वह सब आर्तध्यान कहलाता है। रौद्रध्यान में यह जीव मौज मानता है। जैसे कोई हिंसा करने लगे, झूठ बोले, चोरी करे, कुशील सेवन करे और परिग्रह बहुत बढ़ायें और इन समस्त पापकार्यों को करता हुआ वह मौज भी माने तो यह रौद्रध्यान है। यों आर्तध्यान और रौद्रध्यान तो अशुभ ध्यान बन गए और दो ध्यान शुद्ध बताये गए― धर्मध्यान और शुक्लध्यान। धर्मध्यान तो उसे कहते हैं जहाँ धर्म में चित्त बढ़े। देव पूजा, स्वाध्याय, तपश्चरण आदिक जिनमें भावना पवित्र रहे ये सब धर्मध्यान हैं और शुक्लध्यान वह है जहाँ रागद्वेष मोह नहीं रहे। धर्मध्यान और शुक्लध्यान ये दो समीचीन माने गए हैं और आर्तध्यान व रौद्रध्यान खोटे ध्यान माने गए हैं। इस काल में शुक्ल ध्यान तो बन नहीं सकता। इस पंचम काल में विरक्ति परिणाम से, अधिक से अधिक सप्तम गुणस्थान तक ही जीव पहुँच सकता है। वहाँ शुक्लध्यान नहीं है, पर धर्मध्यान बहुत प्रताप वाला ध्यान है, जिसका संबंध कर्मनिर्जरा से चलता रहा है। नहीं बन सकता शुक्लध्यान किंतु धर्मध्यान की तो हम आपमें योग्यता है। हम अपना धर्मध्यान बना लें। सच समझ लो कि मेरा तो मैं ही आत्मा हूँ, दूसरा कोई मेरा कुछ नहीं है। मैं सबसे न्यारा मात्र ज्ञानानंदस्वरूप हूँ, अत: कोई समय ऐसी सच्ची दृष्टि बने तो वही धर्मध्यान होता है। उसी धर्मध्यान के लिए हम आप सबको विशेष यत्न रखना चाहिए।


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