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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1193

From जैनकोष



स्यातां तत्रार्त्तरौद्रे द्वे दुर्ध्यानेऽत्यंतदु:खदे।

धर्मशुक्ले ततोऽन्ये द्वे कर्मनिर्मूलनक्षमे।।1193।।

उन चार प्रकार के ध्यानों में से आर्तध्यान और रौद्रध्यान ये दो खोटे ध्यान हैं जो कि अत्यंत दु:ख को देने वाले हैं और धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान ये दो समीचीन हैं और कर्म का निर्मूलन करने में समर्थ हैं। मिथ्यात्व अवस्था तब केवल आर्त और रौद्रध्यान रहते हैं, धर्मध्यान नहीं बनता। शुक्लध्यान तो योगीश्वरों के हुआ करता है। आर्त और रौद्रध्यान से हटकर धर्मध्यान में आयें ऐसा उद्यम करना चाहिए, क्योंकि जीव को एक विशुद्ध ध्यान ही शरण है। अब तक जो संसार में इतनी भटकना हुई है वह आर्तध्यान और रौद्रध्यान का ही परिणाम है। ये क्या होते हैं? इसके विस्तार से वर्णन आगे चलेगा, पर संक्षेप में यों जान लें कि जहाँ वेदना सहित ध्यान होता है वह तो आर्तध्यान है और जहाँ मौजसहित ध्यान होता है वह रौद्रध्यान है। विषयों में हिंसा आदिक प्रवृत्तियों में मौज मानते हुए जो चिंतन चलता है वह रौद्रध्यान है। तो उसमें से अब चार प्रकार के ध्यानों में भेद कितने हैं? इसका वर्णन करते हैं।


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