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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 120

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प्रच्यवंते तत: सद्य: प्रविशंति रसातलम्।

भ्रमंत्यनिलवद्विश्वं पतंति नरकोदरे।।120।।

देवों का भी मरकर वायुवत् भ्रमण― यह जीव देवगति और देव आयुकर्म के उदय से स्वर्गों में सागरों पर्यंत दिव्य सुख भोगता है, किंतु अंत उसका भी आता है। आयुक्षय के समय वह उस देवगति से च्युत होकर उस पृथ्वीतल पर जन्म लेता है। देव मरकर देव नहीं हो सकता, अत: उसका तत्काल ऊर्ध्वलोक में जन्म होना असंभव है। यह देव मरकर नारकी भी नहीं बन सकता, इस कारण इसका पृथ्वी के नीचे भी उत्पन्न होना असंभव है। तब मरकर वह इसही पृथ्वीतल पर जन्म लेता है। वह एकेंद्रिय भी बन जाय, अथवा पंचेंद्रिय तिर्यंच, मनुष्य आदि बन जाय, जन्म लेना पड़ता है उन्हें चल करके यहाँ पर भू लोक में। जिस समय वे देव मृत्यु को प्राप्त होते हैं उस समय उनके संक्लेश का क्या ठिकाना? वे इस बात का बहुत दु:ख मानते हैं कि हमारा कैसा दिव्य सुख है, शरीर ही हाड़ माँस अपवित्र चीजों से रहित है, देवांगनायें भी रूपवती और दिव्य देह वाली हैं, भूख प्यास का यहाँ क्लेश नहीं, विक्रिया ऋद्धि है स्वयं जन्मत: जिसके ऐसी है कि एक शरीर के नाना शरीर बना लें, छोटे बड़े बना लें, गुप्त हो जायें, प्रकट हो जायें, ऐसे नाना प्रकार के सुख अब छूटे जा रहे हैं। अब मरकर अपवित्र देह में जन्म लेना पड़ रहा है। यह बात सोच- सोचकर वे देवता बहुत दु:खी होते हैं, पर विधि की गति दुर्निवार है, उन्हें वहाँ से मरण करना पड़ता है, फिर इस पृथ्वीतल पर आकर जन्म लेकर वायु की तरह यहाँ वहाँ भ्रमण करना पड़ता है अर्थात् फिर किसी देह में जन्म लिया, यों जन्म जंमांतरों के भटकनों के बाद कभी वे नरक में भी गिरते हैं।

भवितव्यता की जिम्मेदारी― भैया ! हमारी कैसी भवितव्यता बने इसके लिये हम ही जिम्मेदार हैं दूसरा कोर्इ साथ देने वाला नहीं है। खुद के दिल में पाप हो, खुद स्वयं श्रद्धान्; ज्ञान, आचरण से भ्रष्ट हों तो यह अपने आप ही ऐसे वातावरण को बना लेगा कि दुर्गतियों में जन्म लेना पड़ेगा। यदि अपना आशय पवित्र है, पाप से दूर है, सम्यक्श्रद्धान, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्आचरण का यत्न है, हम अपने परमार्थभूत शरण इस निज अंतस्तत्त्व की ओर झुका करते हैं तो यह सब ऐसा विशुद्ध वातावरण करेगा कि उत्तम गति में जन्म होगा।

समागमों की अविश्वास्यता व अहितरूपता― यह संसार असार है। इन समागमों का कोर्इ विश्वास न करें। ये समागम जितने काल हैं उतने काल भी इन समागमों से कौनसा लाभ हो जायेगा? शांति हो जायेगी क्या? संतोष मिल जायेगा क्या? जब शांति और संतोष ही नहीं मिल पाते हैं तो फिर लाभ की क्या कथनी करें? विश्वास के योग्य अपने आपका सहजस्वरूप है वह कभी हमसे दूर होता नहीं। चाहे हम उसे जान पायें अथवा न जान पायें, वह शाश्वत हम ही में रहता है और अनुकूल है। उस सहजस्वरूप के कारण स्वयं कोई परिणमन होता है तो वह सहजस्वरूप का भान करता हुआ ही होता है। उसका शरण गहें, उसे सार मानें। अन्य समागमों को असार और अहित मानें। यह जीव अपने आपकी सुध खोकर बाह्यपदार्थों में उलझ उलझकर, नाना कल्पनायें रचकर विविध कर्म बंध करता है और नाना देहों में जन्म लेता रहता है। इस संसार से प्रीति मत करो।

आत्महितोपदेश― भैया ! कुछ अपने भीतर एक क्षण को भी तो यह बात लावो। थोड़ी भी क्षणिक वैराग्य की, आत्मदर्शन की बात हो जाय तो इस जीव का मंगल है, इसका कल्याण होगा यदि ऐसी ही तीव्र आसक्ति बनी है, ऐसा ही तीव्र लोभ बना हुआ है कि न वाक्यों का कोई असर नहीं होता, न किसी धर्म क्रिया में हम सही मायने में चित्तवृत्ति बना सकते तो क्या लाभ है? इस जीवन से जीने से फायदा क्या मिला? विषयों के भोग तो पशु पक्षी बनकर भी मिल सकते थे। उन पशुओं की इंद्रिय विषयभोगों से उत्पन्न हुई मौज और इन प्राणियों की इंद्रिय विषयों से उत्पन्न हुई मौज में क्या अंतर है? वे भी कल्पनावश सुखी देखे जाते हैं और यह मनुष्य भी कल्पनावश सुखी देखा जाता है इस मनुष्य देह का लाभ तो धर्मसाधन में है। उस अपने धर्म की सुध लो। इस मोही जगत् की देखा देखी केवल बाह्य पदार्थों में, परिग्रहों में, परिजनों में चित्त मत फँसाये रहो। देखो ना यह जीव देवगति तक हो आता और चलकर मनुष्य तिर्यंच बनकर नरक गति तक चला जाता है और चारों गतियों में डोलता हुआ यह जीव अपने खोटे दिन पूरे करता रहता है।


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