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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 121

From जैनकोष



विडंबयत्यसौ हंत संसार: समयांतरे।

अधमोत्तमपर्यायैर्नियोज्य प्राणिनां गणम्।।121।।

विडंबना― अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि यह संसार, यह विकारी जीवों का समूह समयांतर में ऊँची नीची पर्यायों से जुड़ जुड़कर पिंडरूप बना है, अर्थात् ये विकार जीवों के स्वरूप को अनेक प्रकारों से बिगाड़ते हैं। जैसे यहाँ कोई कम बुद्धि का पुरुष हो तो लो उसको सभ्य अथवा असभ्य मजाक बना बनाकर उसकी विडंबना कर डालते हैं, ऐसे ही यहाँ इन कम अक्ल वाले जीवों को जिनके विवेक नहीं जगा, मिथ्यात्व से ग्रस्त हैं, शुद्ध पथ का जिन्हें आभास ही नहीं है ऐसे इन अज्ञानी जीवों को ये विकार, ये संसारभाव, ये अनेक वातावरण नाना प्रकार से विडंबित कर देते हैं और देखो ना अभी मनुष्य है और छिन में बन जाता है गिजाई कीड़ा, पेड़। क्या से क्या हालत एकदम बदल जाती है? इसे क्या कम विडंबना की बात कहें? लोग कल्पनाएँ करके अपने जीवन की काल्पनिक विपत्तियों के मिटाने में बड़ा जोर लगाया करते हैं और उन कल्पित विपदावों से बचने के लिये किसी से लड़ना पड़े, किसी को बुरा कहना पड़े, किसी का द्वेषी बनना पड़े, अथवा किसी से जूझना पड़े तो यह जीव सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। यह क्या जीव पर कम विपदा है? क्या यह जीव की कम विडंबना है?

विडंबनाविघात का यत्न― अरे आत्मन् ! इस लोक की घटनाओं को विपदा महसूस न करके एक अपने आपके बंधन की विपदा को जरा सामने नजर करें, इनसे छूटना है, एक ही प्रोग्राम है। कैसा तो यह आत्मा अपने स्वभाव से ज्ञानानंदस्वरूप रहने वाला अमूर्त, किसी के छेदे छिदता नहीं, किसी के भेदे भिदता नहीं, पानी में डूबता नहीं, अग्नि में जलता नहीं, वायु से उड़ता नहीं, किसी की लपेट में आता नहीं, ऐसा यह अमूर्त ज्ञानानंदघन आत्मा अपने ही अपराध के कारण कैसी विडंबना में पड़ गया है? बड़े आश्चर्य की बात है। हो गई विडंबना बहुत अधिक। हे आत्मन् ! तेरे में एक कला है जिस शुद्ध कला के प्रयोगमात्र से ये सर्व प्रकार की विपत्तियाँ विडंबनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इस कारण अपने स्वरूप को संभालो और जगत् की इस विडंबनाओं से परे हो जाओ।


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