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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1202

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दृष्टश्रुतानुभूतैस्तै: पदार्थैश्चित्तरंजकै:।

वियोगे यन्मन: खिन्नं स्यादार्त्तं तद्द्वितीयकम्।।1202।।

ऐसे पदार्थ जो कभी देखे अथवा सुने गए अथवा अनुभव में आये हैं उन पदार्थों का वियोग होने से मन को जो खेद होता है उसको आर्तध्यान कहते हैं। आत्मा के लिए सारभूत हितरूप केवल आत्मा के सिद्धि सहजस्वभाव का अनुभवन है। इसके अतिरिक्त आत्मा का कोई शरण नहीं है, सारभूत नहीं हैं, हितरूप नहीं है। इस धनवैभव, परिजन, इज्जत, पोजीशन इत्यादि में कहीं कुछ भी सार का नाम नहीं है। कदाचित् यहाँ के कुछ लोगों ने बड़ा कह दिया, भला बता दिया तो वह भी है क्या? संसार के दु:खी प्राणी हैं उनकी स्यावाशी का अथ्र क्या है? अपने आपमें अपने कल्याण की बात निरखना चाहिए। तो जो देखा गया है, सुना गया है, भोगा गया है अथवा अनुभव किया गया है, इन तीन प्रकार के भोगों में ही तो जीवों की प्रतीति होती है। देख लिया तो मन में वासना बन जाती कि ऐसा मुझे भी होना चाहिए। किसी के पास कार है तो मेरे पास भी होना चाहिए। किसी के पास बड़े-बड़े आराम ये साधन हैं तो वैसे मेरे पास भी होना चाहिए। इन दिखने वाले भोगसाधनों में इस जीव के लालसा उपजती है और यह दु:ख के मार्ग में चला जाता है। कोई बात सुनता है तो सुनकर भी तृष्णा जगती है। कोई बात अनुभव में आती हे, कुछ रसीले भोजन कर लिया तो उसमें लालसा बढ़ जाती है कि ऐसा मुझे भी खाना चाहिए। तो देखे गए, सुने गए, अनुभव किए गए भोगों में लालसायें बढ़ती हैं और वे कदाचित् प्राप्त हो जायें तो कभी वियोग का भी समय आता हे तो उस वियोग के समय में इस जीव को बड़ी विह्वलता बढ़ती है। बंबई में कोई बड़ा ऊँचा गणित का प्रोफेसर था। उसे अपनी स्त्री में इतना अनुराग था कि जब स्त्री मंदिर जाये तो वह उस पर छतरी लगाये रहता था। इतनी कोमल थी वह कि कहीं धूप न लग जाय। तो स्त्री ने समझाया कि इतनी अधिक प्रीति का फल बुरा होगा, हमारे मरने पर फिर तुम्हारी क्या स्थिति होगी? तुम्हारा चित्त वश न रहेगा, उन्मत्त हो जावोगे। और, हुआ भी ऐसा ही। जब स्त्री का वियोग हुआ तो ऐसा उन्मत्त बन गया कि उसके फोटो को लिए रहे और उस ही फोटो से बातें करे। एक बार बनारस में कोई एक धर्मशाला में ठहरा था। बगल के ही कमरे में चिरोंजा बाईजी भी रहती थी जिन्होंने बड़े वर्णी जी को पढ़ाया था। जब वह उस फोटो से कुछ बातें कर रहा था― अभी रोटी नहीं बनाओगी, भूख लग रही है आदि, तब बाईजी ने उसके पास जाकर पूछा कि तुम किससे बातें कर रहे हो? तुम्हारे पास तो कोई नहीं है। तो उसने सारा किस्सा सुनाया। तो यहाँ जिस जिसका संयोग हुआ है उसका वियोग नियम से होगा। आप सच समझिये कि संसार में बाहरी कोई भी पदार्थ आत्मा के लिए हितरूप नहीं है, सब भिन्न हैं। उनमें आसक्ति करना यह अंत में क्लेश का ही कारण बनता है। अत: इष्टवियोगज आर्तध्यान से बचना है तो अभी से यह तपश्चरण किया जाय कि समागम को क्षणिक मान लें। यह तो क्षण भर का समागम हे, ये सभी बिखरेंगे, ऐसा निरखते रहें तो भविष्य में इष्टवियोगज आर्तध्यान न भोगना पड़ेगा। तो इन चित्तरंजक इष्ट पदार्थों का जब वियोग होता है तो मन में बड़ा खेद उत्पन्न होता है। उस खेदखिन्नता में इष्टवियोगज नाम का आर्तध्यान होता है। पहिले तो था अनिष्टसंयोगज, अनिष्ट चीज का संयोग होने पर दु:खी हो रहा था, जिससे मन न मिले उससे चित्त चाहता हे कि यह यहाँ से हट जाय। अनिष्टसंयोग में भी वेदना होती है इस जीव को और अब इष्टवियोग में भी यह पुरुष ऐसा भूल वाला हो जाता कि अपने आत्मा का उद्धार करने योग्य नहीं होता। यों खोटे ध्यानों को तो तजना चाहिए और देव, शास्त्र, गुरु का अनुराग ऐसे-ऐसे विशिष्ट ध्यानों में अपनी परिणति करना चाहिए तो आत्मा का अवसर मिलेगा और मोक्षमार्ग में लगना आगे बढ़ता रहेगा।


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