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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1203

From जैनकोष



मनोज्ञवस्तुविध्वंसे मनस्तत्संगमार्थिभि:।

क्लिश्यते यत्तदेतत्स्याद्द्वितीयार्त्तस्य लक्षणम्।।1203।।

मनोज्ञवस्तु का विध्वंस होने पर उस वस्तु के संगम की चाह करने वाले लोग क्लेश करते हैं, मन संक्लेश में होता है ऐसे पीड़ारूप ध्यान को इष्टवियोगज नामक आर्तध्यान कहते हैं। अब इसमें ध्यान का स्वरूप साक्षात् बताया जा रहा है। पहिले तो इसका प्रभाव इसके बिना होने वाले कष्ट, विडंबनाएँ, इनका उपाय ध्यान करने वाले की प्रशंसा, ये सब वर्णन हो चुके, अब ध्यान का ही स्वरूप चल रहा है जिसमें प्रथम यह बताया जा रहा कि दो प्रकार के ध्यान आर्त और रौद्र वे आत्मध्यान के विघातक हैं। ध्यान तो ये भी हैं, पर ये संसार के मार्ग हैं और आत्मध्यान से विमुख करने वाले हैं। इष्टवियोगज आर्तध्यान और अनिष्टसंयोगज आर्तध्यान, दो ये हैं। अब वेदनाप्रभव आर्तध्यान का स्वरूप कहते हैं।


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