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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1204

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कासश्वासभगंदरोदरजराकुष्ठातिसारज्वरै:,पित्तश्लेष्ममरुत्प्रकोपजनितैरोगै: शरीरांतकै:।

स्यात्सत्त्वप्रबलै: प्रतिक्षणभवैर्यद्व्याकुलत्वं नृणां,तद्रोगार्त्तनिंदितै: प्रकटितं दुर्वारदु:खाकरं।।1204।।

वात पित्त कफ प्रकोप से उत्पन्न हुए जो रोग हैं जो शरीर को नाश करने वाले हैं, बड़े प्रबल हैं, क्षण-क्षण में उत्पन्न होते हैं ऐसे जो श्वास आदिक अनेक राग हैं, उन रोगों से जो मनुष्यों के व्याकुलता होती है उसे रोग पीड़ा, चिंतन नाम का आर्तध्यान कहा है। जहाँ तीन की समता है― वात पित्त कफ, वहाँ तो शरीर की स्वच्छता है और जहाँ इन तीनों में विषमता हुई वहाँ शरीर में रोग हुआ। यही हालत आत्मा की है― सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र। इन तीन की जहाँ एकता है वहाँ तो शांति का मार्ग है और जहाँ अविषमता है, अपने स्वभाव से, स्वरूप से चलित हो जाता हैं वहाँ संसार की अनेक विडंबनाएँ होती हैं। जो वात पित्त कफ के प्रकोप से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और नाड़ी से उन्हीं वात पित्त कफ के प्रकोप का अनुमान किया जाता है। वात नाम है वायु का। जो शरीर में वायु है जो बढ़ जाय पेट में, शूल का रोग बढ़ जाय वह वायु प्रकोप है। वायु का प्रकोप हो जाय, पेट फूल जाय, बेचैनी बढ़ती है, और उस वायु का धक्का लगने से हार्ट तक फैल हो जाता है। तो वायु शरीर के लाभ के लिए है, कंपित हो जाय तो वही वायु शरीर के विनाश के लिए है। पित्त में गर्मी बढ़ती है और पित्त संबंधी अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। कफ में ठंढक बढ़ती है और कफ संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं। कफ के प्रकोप से जहाँ वायु कंपित हो जाता है वहाँ सन्निपात हो जाता है। सन्निपात बड़ा कठिन रोग है। यों वात पित्त कफ की असमता से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। तो उस समय मनुष्य के जो पीड़ा होती है, जो चिंतन होता है वह है वेदनाप्रभव नाम का आर्तध्यान। रोग तो जो भी हो वही पहाड़ सा दिखता है। फोड़ा-फँसी तो एक साधारण सी बात मानी जाती है पर वह भी एक पहाड़ जैसा दिखता है। ये फोड़ा-फुँसी तो किसी नस पर ही हुआ करते हैं। जब उस फोड़ा-फुँसी की वेदना नहीं सही जाती है तो ऐसा कहते हुए लोग पाये जाते हैं कि इस फोड़ा-फँसी की वेदना से तो बुखार की ही वेदना ठीक थी। इस फुँसी की वेदना तो नहीं सही जा रही है। कहीं पसीना बहुत आया, मैल जम गया तो उससे जो खाज होती है उस खाज के खुजाने में जो पीड़ा होती है वह पीड़ा भी इन प्राणियों को बड़ी कठिन वेदना करने वाली दिखती है। फिर रोग है कितने, करोड़ों की गिनती में हैं, उन रोगों में जो पीड़ा वेदना होती है उस समय का जो चिंतन है उसे रोगपीड़ाचिंतन नामक ध्यान कहते हैं। बड़े-बड़े पुरुष बड़े-बड़े उपसर्गों को सह सकने का जिन्होंने अभ्यास नहीं किया है वे रोगों में विचलित हो जाते हैं।


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