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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 13

From जैनकोष



महामतिभिर्नि:शेषसिद्धांतपथपारगै:।

क्रियते यत्र दिग्मोहस्तत्र कोऽन्य: प्रसर्पति।।13।।

सिद्धांतपथ में महामतियों के दिग्मोह की संभावना―अरे जहाँ बड़ी बुद्धि वाले लोग, इस सिद्धांत मार्ग के पार करने वाले भी लोग दिशा भूल जाते हैं, तब अन्यजन उसे किस प्रकार पार कर सकते हैं? यह ज्ञानार्णव, यह ज्ञानसमुद्र अथाह है। इसमें बड़े-बड़े बुद्धिमान पुरुष भी भूल जाते हैं चकरा जाते हैं, अन्य पुरुषों का तो कहना ही क्याहै? जिन्होंने बड़े-बड़े शास्त्रों का अध्ययन किया, राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक, अष्टसहस्री इत्यादि, वे समझ सकते होंगे कि आचार्यों की कितनी प्रखर बुद्धि थी, कैसा सुलझा हुआ सूक्ष्मतत्त्व किस प्रकार के वचनों से उन्होंने प्रस्तुत किया है, वे भी यह कहते हैं कि हम अल्प बुद्धि वाले हैं। हम इसमें कहाँ पार पा सकते हैं?

श्रद्धालु व मूढ़ों की पद्धति का अंतर― भैया ! कलिकी महिमा देखो―यह आज के समय का दुर्भाग्य कहिये या लोगों का दुर्भाग्य कहिये कि कुछ लोग ऐसे भी साधु संत रूप में आकर खड़े हो जाते हैं कि जो यह कहने का भी साहस और यत्न करते हैं कि यह आचार्य भूल गये, यह गलत है, हम जो लिखते हैं वह सही है और इन अश्रद्धालुवों को प्रोत्साहन देने वाले भी हम हैं। भक्ता तत्त्वार्थसूत्र अथवा षटषंडागम जैसे बड़े ग्रंथों की टीका करने वाले अनेक आचार्य हुए हैं और उन आचार्यों ने सूत्रों में एक-एक शब्द का सार्थक्य बताया है, और कदाचित् कोई शब्द फालतू भी हो जाय, फालतू नहीं होता पर बोलने की एक शैली हुआ करती है। कुछ विश्राम लेने के लिये कोई शब्द आ जाय तो उस शब्द में आचार्य ने बड़ी महिमा प्रकट की है। उन ऋषि संतों द्वारा जो टीकायें की गई हैं उनमें दोषप्रतिपादन करने की बात कहीं पर नहीं आयी है। ये कहलाते हैं श्रद्धालुजन।

सिद्धांत की गहनता―आचार्यदेव यहाँ कह रहे हैं कि बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी गहन शास्त्रों की चर्चा में चूक जाते हैं तो हम लोगों की बात ही क्याहै?समयसार ग्रंथ अध्यात्मग्रंथों में एक प्रधान ग्रंथ है। कैसे-कैसे रत्न उसमें छिपे पड़े हैं? विद्वान् पुरुषों की दृष्टि में उन्हें नहीं पहुँचाया है प्रमादवश, पर जिन समझदार लोगों के हाथ में यह ग्रंथ पहुँचता है वे उसकी महिमा को जानते हैं। श्रीमद् रामचंद्र जो कि गांधी जी के भी गुरु थे, गांधी जी ने विलायत जाते समय जिनसे कुछ व्रतों का संकल्प किया था, वे प्रसिद्ध जौहरी थे पि. जैन। उनके हाथ में जिस समय किसी ने समयसार ग्रंथ दिया और उसकी पहिली दो पंक्तियाँ पढ़ी तो तुरंत ही इतने हर्षित हुये कि यह न देखा कि हम पुरस्कार में इसे क्या दिये जा रहे हैं? जो भी हाथ की मुट्ठी में आया वह उसे इनाम दे दिया। उसमें बहुत से हीरा रत्न थ।

जड़ वैभव की नि:सारता― भैया ! तीनों लोकों का वैभव भी ये सब जड़ पदार्थ हैं, ये क्या वैभव हैं। यथार्थ वैभव तो सम्यग्ज्ञान है और वही वास्तविक अमीर है जिसने निज को निज पर को पर अनुभव किया, रहना तो किसी के पास कुछ भी नहीं है, छूटेगा तो निश्चय से। अब बुद्धिमानी यह है कि उसे अपने जीवन में ही समझ बूझकर ज्ञानोपयोग का बल बढ़ाकर उसे छोड दें। छूटना सबका ही है। एक बार अकबर बादशाह ने बीरबल से पूछा― बीरबल यह तो बतलावो कि हमारी हथेली में रोम क्यों नहीं हैं? किसी की भी हथेली में रोम नहीं होते हैं ना? तो बीरबल बोला― महाराज ! आपने अपने हाथों से इतना दान दिया कि दान देते-देते आपकी हथेली के रोम झड़ गये। अच्छा, बीरबल ! तुम्हारी हथेली में रोम क्यों नहीं हैं? बीरबल बोला― महाराज !आपसे मैंने इतना दान लिया कि दान लेते-लेते हथेली के रोम झड़ गये। और ये सभी जो सभा में बैठे हैं इनके हाथों की हथेली में रोम क्यों नहीं हैं? महाराज ! आपने दान दिया, मैंने लिया और बाकी यों ही हाथ मलते रह गये, सो हाथ मलते-मलते हथेली के सारे रोम झड़ गये।

यथार्थ प्रकाश में भलाई― भैया ! छूटना तो सबका है, बुद्धिमानी यह है कि विवेक पूर्वक इस जीवन में ही पर को छोड दिया जाय। यदि नहीं छोड सकते तो पर को छूटा हुआ ही समझ लें, उससे विरक्त रहें। अन्यथा कोई होनहार अच्छा न रहेगा। यह तो एक निमित्तनैमित्तिक अथवा वैधानिक बात है कि उस धन वैभव के पीछे कुछ ऐसा वातावरण बन जायगा कि उसके पीछे दु:खी होना पड़ेगा। जैन शासन की सच्ची उपासना यही है कि सम्यग्ज्ञान उत्पन्न कर लें। अंतरंग में समझ तो जावें कि यह मैं हूँ और ये सब परतत्त्व हैं। ऐसे प्रकट भिन्न आत्मस्वरूप को इस ग्रंथ में दिखाया जायेगा।

ग्रंथकर्ता का लघुता प्रदर्शन इस ग्रंथ को बनाते हुए आचार्यदेव कह रहे हैं कि इसमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् कहीं-कहीं चूक सकते हैं तो हम सरीखे छोटे लोग इस ग्रंथ को यथावत् न विदित कर सकें यह तो हो ही सकता है। देखिये कोई काम परोपकार का करे और अपने मुख से कह दें दूसरों पर अहसान लाद दें कि देखो मैंने ऐसा किया तो लोगों की दृष्टि में वह शोभा नहीं देता है। और कहने में कितना आनंद आता कि भाई मैंने कुछ नहीं किया।आप लोगों का उत्साह था, आप लोगों की भावना थी, आप सब लोगों का प्रताप था सो यह काम बन गया। ऐसा यदि वह कहता है तो इसमें उसकी इज्जत बढ़ जाती है। अगर कोई ग्रंथ बनाने वाला भूमिका में ही यह बात लिख दे कि यह ग्रंथ मैं ऐसा लिखूँगा जैसा कि तुम्हारे बाप दादों ने भी न लिखा होगा तो कौन उसकी इज्जत करेगा? उसकी न कोई सुनेगा और न किसी का उस ग्रंथ के प्रति आकर्षण होगा। जब इसे ही ज्ञान नहीं है, ज्ञानरस में खुद नहीं डूब सकता है तो यह कहेगा ही क्या? आचार्यदेव भूमिका में अपनी लघुता प्रदर्शित कर रहे हैं।


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