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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 14

From जैनकोष



समंतभद्रादिकवींद्रभास्वतां स्फुरंति यत्रामलसूक्तरश्मय:।

व्रजंति खद्योतवदेव हास्यतां न तत्र किं ज्ञानलवोद्धता जना:।।14।।

अगाध ज्ञान में अल्पज्ञों की दुर्गमता― जहाँ समंतभद्र आदिक बड़े-बड़े कवींद्र रूपी सूर्य की निर्मल उत्तम वचन किरणें फैलती हैं वहाँथोड़ा ज्ञान पाये हुये जंतुवों के समान मनुष्य क्या अपनी हँसी न करायेगा? भला जब समंतभद्राचार्य के ज्ञान का कुछ अंदाज बनता है तब यह बहुत जल्दी समझ में आता है कि जरूर केवलज्ञान अनंत, असीम व अथाह है। जब इस ज्ञान की भी बड़ी महिमा है तो केवलज्ञान की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है और देखो जो सातिशय महिमा वाला है केवलज्ञान, वह केवलज्ञान हम आप सबमें शक्ति और स्वभाव में बराबर पडा हुआ है। केवल एक परपदार्थों को पर समझकर तत्त्वसंबंधी रागद्वेष मोह को दूर करने भर का काम है। यह केवलज्ञान तो प्रकट होने के लिये अभी भी बैठा है, बड़ा प्रकाश होता है। सूर्य के नीचे बादल की टुकड़ी आ जाये तो बादल चलने फिरने वाले हैं, सूर्य भी चलता है, तो वह प्रकाश करने के लिये ही उद्यत है। ऐसे ही यह रागद्वेष मोहादिका आवरण इस ज्ञानपुंज पर पड़ा हुआ है, इसके कारण केवलज्ञान प्रकट नहीं हो पाता है। एक ये आवरण ही हट जायें तो यह केवलज्ञान तो सदा प्रकट होने के लिये उद्यत है। जो इसकी महिमा है उसे समझें नहीं तो अपनी सांसारिक पर्यायों पर दृष्टि देकर अपने को तुच्छ मानते हुये हम बड़ी खोटी स्थिति में पड़े हुए हैं, बंधन में बंधे हैं।

समंतभद्र स्वामी की स्तवन कुशलता― समंतभद्र स्वामी ने एक स्तोत्र बनाया जिसका नाम है स्वयंभूस्तोत्र, जबकि अपनी भस्मव्याधि को दूर करने के लिये खूब अन्न खाकर भस्मव्याधि मेटी थी। बाद में राजा ने कहा कि तुमको हमारी मूर्ति को नमस्कार करनाहोगा।कहा अच्छा कल नमस्कार करेंगे। रात्रि को स्वयंभू स्तोत्र में24 भगवानकी स्तुति करने लगे। 8वें भगवान की स्तुति करते समय चक्रेश्वरी देवी प्रकट हुई, बोली महाराज, आप चिंता न करें। यह मूर्ति तुम्हारे नमस्कार को झेल नहीं सकती। जब उस मूर्ति को नमस्कार करने लगे तो उसमें चंद्रप्रभु की मूर्ति प्रकट हो गई। आप कहेंगे कि 7 तीर्थंकरों की स्तुति में गुणानुवाद तो किया था, पर नमस्कार न किया था। 8वें तीर्थंकर की स्तुति में नमस्कार करता हूँ इतना शब्द कह दिया जिससे मूर्ति प्रकट हुई।

समंतभद्र स्वामी की परीक्षा प्रधानता― समंतभद्राचार्य ने आप्तमीमांसा रची, पश्चात् उन्होंने युक्त्यनुशासन ग्रंथ बनाया, जिसमें प्रथम ही प्रथम कहा है कि हे भगवान अब मैं आपका स्तवन करता हूँ। आप्तमीमांसा में भी किस तरह स्तवन किया हैं कि सारा लोक दर्शन आ गया, स्याद्वाद ने उसका समर्थन किया नयचक्र के विभाग से कहकर व फिर स्याद्वाद सिद्धांत रखा, इतनी बड़ी स्तुति करने के बाद कहते हैं कि अब में स्तुति करता हूँ। ऐसा क्यों? सुनो नाथ, अब तक तो मैंने आप्तमीमांसा में आपकी परीक्षा की, कि मेरे स्तवन के लायक है कौन? अब मैंने सिद्ध कर लिया, मेरे स्तवन के लायक ये वीतराग देव है, उनको अब मैं नमस्कार करता हूँ। एक स्तवन तो परीक्षा-परीक्षा में ही बना डाला।

आप्त की मीमांसा―आप्त मीमांसा के स्तवन का थोड़ासा प्रारंभ का सारांश सुनायें― हे नाथ ! आपके पास देव आते हैं इसलिये आप बड़े नहीं, आप आकाश में चलते हो इसलिये आप बड़े नहीं, आप पर चमर ढुलते हैं इसलिये आप बड़े नहीं। भगवान की ओर से कोई वकील कहने लगे कि ऐसा क्यों है? तो कहते हैं कि ये बातें तो मायावी पुरुषों में भी पायी जा सकती हैं। अच्छा तो भगवान का शरीर पवित्र है, परमौदारिक है तो भगवान बड़े हैं कि नहीं? ऐसा मानो भगवान की ओर से कोई कह रहा है। तो कहते हैं कि ऐसा दिव्य शरीर तो इंद्रों के, देवों के भी पाया जा सकता है, इससे भी आप बड़े नहीं हैं। तो फिर किस बात से बड़े हैं। दोष, अज्ञान, आवरण हट जाने से निर्दोषता प्रकट हुई है इसलिये आप बड़े हैं।महाराज जो निर्दोष होता है उसके वचन भी अच्छे निकलते हैं, मैंने आपके वचनों से पहिचाना कि आप निर्दोष हैं। ऐसे निर्दोष वचनों का विश्लेषण समंतभद्र ने किया, उसका मर्म तो वे ही समझ सकते हैं जो ज्ञानीजन हैं।

महापुरुषों की निरंकारता का दर्शन― यहाँ शुभचंद्र आचार्य कह रहे हैं कि समंतभद्र आदिक सूर्य की जहाँ वचन किरणें फैल रही हों वहाँ कुछ अल्पज्ञ पटजुगनू क्या प्रकाश करेंगे? तो चुप होकर क्यों नहीं बैठ जाते? उद्यम ही क्यों करते? उद्यम यों किया है कि साधारणजन भी ज्ञान प्राप्त करें, लोगों को जताने के लिये यह उद्यम आचार्यदेव ग्रंथ बनाने से पहले अपनी लघुता प्रकट कर रहे हैं। हम आपको भी यह शिक्षा लेना चाहिये कि किसी बात में अहंकार न आने पावे। क्या ज्ञान पाया है?क्या वैभव पाया है। बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े वैभववान् हुए हैं। अपना काम निकाल लें ज्ञान बढ़ाकर इस भव को और जैनशासन के समागम को सफल करें।


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