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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1300

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वर्षातपतुषारादिपवनासारवर्जिते।

स्थाने जागर्त्यविश्रांतं यमी जंमार्तिशांतये।।1300।।

वर्षा, गर्मी, हिम, ठंड, प्रचंड ग्रीष्म आदिक उपद्रवों से रहित स्थान में ध्यानार्थी पुरुष निरंतर ठहरें। मोही जनों को उनके इस एकांत निवास के संबंध में यह शंका होती है कि इनके दिमाग में क्या फितूर आया, ये गाँव में नहीं रहते, महलों में नहीं रहते, सुख में नहीं रहते, भूख, प्यास, ठंड, गर्मी आदि की बड़ी वेदनाएँ सहते, क्या हो गया इनके, कुछ समझ में नहीं आता। जिस स्थान में कोई नहीं रहता, निर्जन स्थान है, पास में एक पैसा भी नहीं रखते हैं, ये कैसे रहते होंगे, ऐसा मोही जनों को आश्चर्य हुआ करता है। लेकिन उन तत्त्वज्ञानी धर्मार्थी योगी पुरुषों को भी एक ऐसा शरण मिल गया, अपने आपके आत्मा से ही बातें करते रहते हैं। अनुभव में आ गया जब चाहे झट अपने स्वरूप में मग्न होकर सुखी रहते हैं। गुण विकसित हो जायें तो उससे भी अधिक विकास की सामर्थ्य से बातें करके प्रसन्न रहते हैं। कोई पाप हो जाय तो अपने आपके इस परमपिता के निकट बैठकर खूब रोकर पछता कर यों दु:खदर्द निकालकर भाररहित बन जाते हैं। ऐसी शरण अपने आपको छोड़कर बाहर में कहाँ मिलेगी? कौन है ऐसा रक्षक शरण समर्थ प्रभु जो इन दीन पुरुषों को हस्तावलंबन दे सके। ध्यानार्थी पुरुषों को ऐसे ध्यान योग्य श्लोक-1301


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