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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1347

From जैनकोष



एवं भावयत: स्वांते यात्यविद्या क्षयं क्षणात्।

विमदीस्युस्तथाक्षाणि कषायरिपुभि: समम्।।1347।।

इस प्रकार मन को वश में करके भावना करने वाले पुरुष के अविद्या तो क्षण मात्र में नष्ट हो जाती है और इंद्रियाँ मंदरहित भी हो जाती हैं। उनके साथ ही साथ कषायें भी क्षीण हो जाती हैं। पवन रोकने से तो मन वश होता है। यह तो खुद अनुभव करके देखा जा सकता है। श्वास को रोक लीजिए तो मन बाहर में न दौड़ेगा, मन वश हो जायगा और मन के वश हो जाने से फिर भीतर में उपयोग लग जायगा। तो ज्ञान का प्रकाश स्वयमेव होगा, स्वयं ही ज्ञान आयगा। कुछ बाहर में पुस्तकें पढ़ना या ऐसा यत्न करना इसकी जरूरत न रहेगी। तो मन के वश होने से अज्ञान दूर होता हे, ज्ञान का प्रकाश होता है, आत्मा खुद ज्ञानमय है। तो यह बाहरी पदार्थों में नहीं लगा मन। यह उपयोग बाहर में न फँसे तो ज्ञान विकास स्वयमेव हो जाता है। और जब अविद्या दूर हुई, ज्ञान का विकास हुआ तो कषायें भी क्षीण हो जाती हैं। क्रोधभाव कब उत्पन्न होता है जब अपने आपकी सच्ची सुध नहीं रहती है। मैं क्या हूँ? इसका पता न हो, शरीर में ही आत्मीयता की बुद्धि हो तब अपने आपकी सच्ची सुध न हो। क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक कषायें भी इस पर्यायबुद्धि के कारण आती हैं। इस शरीर को यों ही आपा मान लिया तो अब उसे इसकी इज्जत बढ़ाने की पड़ती है। इज्जत बढ़ाने का भाव आयगा तो घमंड होगा, फिर मानकषाय जगता है। जग जाय, खैर मानकषाय उससे कोई नुकसान न था। यदि जैसा चाहता है वैसा हो जाना इसके वश का होता। चाहता है यह इज्जत लेकिन और लोग भी तो कुछ दम रखने वाले हैं, उससे हीन दीन नहीं बनना चाहते। कोई इज्जत न करेगा तो मानकषाय करने वाला दु:खी होता है।

मायाचार कब प्रकट होता है? किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा रखना और उसके मिलने में अड़चन है तो हम लोगों से मायाचार करते हैं। मायाचार का भी साधन ममता है और लोभ का भी कारण स्पष्ट मानो कि ममता है। यों कषाय जगती है उसके जिसके तत्त्वज्ञान नहीं है। तो कषाय दूर करने के लिए तत्त्वज्ञान चाहिए और इन ज्ञानप्रकाश के अनुभव का साधन मन की एकाग्रता है और मन की एकाग्रता का साधन प्राणायाम है। इस कारण कुछ न कुछ प्राणायाम का अभ्यास करें और स्वयमेव हो अभ्यास, कुछ यत्न भी न करें, जैसे सामायिक करते, ध्यान करते तो उस समय शांत बैठ जायें तो श्वास धीरे-धीरे चलेगी। कोई क्रोध करता हो तो उसका श्वास जल्दी-जल्दी निकलेगा। जब श्वास जल्दी चलता हे तो ध्यान टिक नहीं पाता। जैसे जिसके श्वास रोग हो तो जब वह ध्यान में बैठेगा तो ध्यान क्या कर पायगा? ऐसी ही यहाँ भी बात है कि हम यदि पवन को वश नहीं कर पाते तो मन हमारा वश नहीं होता, फिर ज्ञानप्रकाश नहीं होता, फिर कषायें दूर नहीं होती। तो कषायें दूर करने के लिए चाहिए ज्ञान। ज्ञान के लिए चाहिए मनन। उसके लिए चाहिए चित्त की एकाग्रता। और चित्त की एकाग्रता का साधन है प्राणायाम। धीरे से हवा को खींचना और अपने नाभिकमल पर उसे स्थिर करना और बाद में धीरे-धीरे छोड़ना, यही है साधन एक ध्यान में।




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