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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1348

From जैनकोष



कुत्र श्वसनविश्राम: का नाड्य: संक्रम: कथम्।

का मंडलगति: केयं प्रवृत्तिरिति बुद्धयते।।1348।।

अब इस पवन के साधन से ऐसा ज्ञात होता है कि इस श्वासरूपी पवन का कहाँ तो विश्राम हैं और नाड़ियाँ कितनी और कौन-कौन हैं? उन नाड़ियों का पलटना इस प्रकार होता है जैसे मंडल गति कहाँ है, इसकी प्रगति कहाँ है, ये सब बातें प्राणायाम के साधनों से विदित होती हैं। जैसे आँखें मींचकर अथवा अंधेरे में हाथ से टटोलकर चीजों का परिज्ञान करते हैं, यह चौकी है, यह दरी है यों निरखते हैं इसी तरह जिसकी साधना अच्छी बन जाती है वह हवा से शरीर के अंदर नाड़ियों को छू-छूकर जान लेता है। यह हमारी पशुली है, नाड़ी है, यों प्राणायाम की साधना करने वाले लोग जान जाते हैं। वे समझते हैं कि इस श्वासरूपी पवन का कहाँ विश्राम है, कहाँ रह जाती है वायु? किस जगह उसके रहने का स्थान है? देह में कितनी नाड़ियाँ हैं और उनकी पलटन किस प्रकार होती है? एक आसन है कि हवा भरकर बैठ जाय, नाड़ियों को नसों को चलाता फिरे, इस प्रकार का जो आसन करता है उसका साधन प्राणायाम है, हवा है। तो शरीर में बसने वाली हवाओं में तो इतनी शक्ति हे कि अपने ही शरीर के अंदर की नसाजालों को कहीं से कहीं पहुँचा दे, घुमा दे, इतना तक पवन का काम है। श्वास का काम, हवा का काम ऐसे रोगों को पैदा कर देता है जिसे उदर शूल बोलते। पेट में एक ऐसा दर्द हो जाता कि उसे रोगी सम्हाल न सके तो वह रोग उत्पन्न होता है वायु की रुकावट से, वायु के अनुचित जगह में पहुँच जाने से। जब वायु बिगड़ती है तो अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और जब वायु शुद्ध रहती है उसका सही संचार किया जाता है तो उससे अनेक चमत्कार सिद्ध हो जाते हैं। तो ये भी सब ज्ञान हो जाते हैं प्राणायाम से कि नाड़ियाँ कितनी हैं और उन नाड़ियों को कैसे पलट लिया जाता है तथा इसकी मंगलगति कौनसी है? एक रुक करके रूप में रहकर गोल-गोल चलकर इस वायु की गति कहाँ-कहाँ होती है? ये फोड़ा फुंसी जो विशेष हो जाते हैं उसका कारण भी वायु का किसी जगह रुक जाना है। शरीर में हवा भीतर-भीतर चलती रहती है, और वह चलती हुई हवा बाहर में एक छोटे से स्थान पर रुक जाय तो वहाँ फोड़ा-फुंसी आदिक हो जाते हैं। तो जब हवा में रोग उत्पन्न करने की सामर्थ्य है तो उस ही हवा में बड़ी-बड़ी समृद्धियाँ भी उत्पन्न करने की सामर्थ्य है।


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