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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1363

From जैनकोष



स्तंभादिके महेंद्रो वरुण: शस्तेषु सर्वेकार्येषु।

चलमलिनेषु च वायुर्वश्यादौ वह्निरुद्देश्य:।।1363।।

चार प्रकार के पवनमंडल हैं― पृथ्वीमंडल, वरुणमंडल, जलमंडल और अग्निमंडल, जिनका कि स्वरूप बहुत कह चुके हैं कि नासिका से जब श्वास बारह अंगुल दूर से आयी और निकलने पर प्रभाव हुआ― जो सीधी समान रेखा पर चले, ऐसी वायु को पृथ्वीमंडल की वायु कहते हैं। और जो कुछ शीतलता लिए हुए नासिका के किसी कोण से चंद्ररेखा की तरह साधारण तिरछी वायु चले वह वरुणमंडल की वायु है। यह नाक से जो श्वास निकलती है उसका वर्णन चल रहा है। उस श्वास की परख से मनुष्य दूसरों के शुभ अशुभ और भविष्य को अपने भी शुभ-अशुभ और भविष्य को जान लेते हैं। वायुमंडल में एकदम तिरछी गोल हवा निकलती हे और वह चार ही अंगुल प्रमाण बाहर अपना प्रभाव दिखाती है। ऐसी वायुमंडल की पवन है। अग्निमंडल की पवन अति उष्ण होती है और तिरछी लपट और चंचलता लिए हुए होती है। यों चार प्रकार के जो श्वासमंडल हैं उनमें किस मंडल का प्रभाव किस रूप पड़ता है? इन कार्यों में कौनसा मंडल शुभ माना गया है और कौनसा मंडल किस कार्य को करने की प्रेरणा देता है? तो पुरुष के जो स्तंबन आदिक कार्य करना हो तो पृथ्वीमंडल की पवन में वह शुभ है, स्थिर कार्य करना हो तो ऐसे कार्य पृथ्वीमंडल में करना चाहिए। और जितने भी समस्त शुभ कार्य हैं उन सबमें वरुणमंडल श्रेष्ठ है। जैसे जलमंडल को पवन कहा है और जितने चलित कार्य हों, मलिन कार्य हों उनमें वायुमंडल की पवन श्रेष्ठ है और किसी को वश करना हो, किसी को बैरी का मुकाबला करना हो ऐसे अवसर में अग्निमंडल ठीक माना गया है।


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