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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1364

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छत्रगजतुरगचामररामाराज्यादिसकलकल्याणम्।

माहेंद्रो वदति फलं मनोगतं सर्वकार्येषु।।1364।।

पृथ्वीमंडल की वायु बड़े-बड़े वैभवों के स्वामित्व का संकेत करती है। छत्र, हाथी, घोड़ा, चमार, स्त्री, राज्य आदिक जितने भी वैभव हैं, समृद्धियाँ हैं, कल्याण हैं उन सब कल्याणों का अथवा सर्व कार्यों में जो भी मन में विचार लिया है ऐसे मनोगत फल को पृथ्वीमंडल कहते हैं। प्राणायाम की साधना वाले लोग इन पवनों की विभिन्नतावों से शुभ अशुभ सगुन असगुन भविष्य का विचार कर लेते हैं। यहाँ श्वास के निकलने के ढंगों से शुभ अशुभ भविष्य का विचार कर लेने की बात चल रही है। वहाँ तो एक साधारण रूप से बायें नाक से जब श्वास चलती हो उस समय में स्थिर कार्य करना चाहिए और जब दाहिनी नासिका से श्वास चलती हो तो उस समय चलित कार्य, जाने आने के कार्य, व्यापार आदिक के कार्य करने चाहिए। इसी प्रकार जो स्वरविज्ञान के अनुसार चलते हैं वे यत्न करते हैं कि जब दाहिनी नाक बिंदु से श्वास चले तो भोजन करते हैं और वे इन श्वासों के बदलने की क्रिया को करते हैं। बायाँ स्वर चल रहा है और बदलकर दाहिना स्वर बना हो, तो सुनने में ऐसा लगेगा कुछ कि क्या यह अपने वश की बात है कि अभी तो दाहिनी श्वास चल रही थी और अब बदलकर बायीं श्वास चला दे। पर जो प्राणायाम के तंत्र हैं उनमें इसकी क्रिया बतायी गयी है। यह सारा शरीर तिरछी नसों से जकड़ा है। दाहिने तरफ के अंग को जकड़ने वाली नसें बाईं तरफ मिलती हैं और बायें तरफ के अंग को जकड़ने वाली नसें दाहिनी तरफ मिलती हैं। तो बायें स्वर से दायाँ स्वर बदलने वाले योगी दाहिनी काँख को दबाते हैं। काँख में कोई वस्त्र आदिक रखकर उसे दबाने से थोड़े ही समय बाद यह बायां स्वर बदलकर दाहिने स्वर में आता है। जब भोजन आदिक का अवसर होता है उस समय स्वर विज्ञान के जाननहार योगी इस क्रिया को करते हैं। उनका मंतव्य है कि दाहिने स्वर में सूर्यस्वर में किया हुआ भोजन सपच होता है और शरीर को लाभ देता है। कुछ अनुभव में ऐसा लगता होगा भी कि जब बामस्वर चलता है तब शांति संतोष ये सब बने से रहते हैं और जब सूर्य स्वर चलता है तो अशांति असंतोष कुछ क्षोभ विकल्पों का विस्तार इनकी रचना होती है। इस ध्यान के प्रकरण में इन स्वरों का और प्राणायाम का विधान क्यों बताया जा रहा कि इन सबका संबंध उपचार से निमित्त रूप में होता है। तो जितनी भी ये ऋद्धियाँ सिद्धियाँ हों सर्व कार्यों में मनोगत फल यह सब पृथ्वीमंडल की पवन से चलता है। वैसे आगे कहीं बताया जायगा कृष्ण पक्ष के शुरू के तीन दिन में प्रात:काल सुबह उठने पर अपने स्वर की परख करें। यदि बामस्वर चल रहा है उस समय तो वह यह निर्धारण करता है कि हमारा यह दिन अच्छा बीतेगा, शांति में बीतेगा। इसके बाद के तीन दिन चौथे, पांचवें, छठे को प्रात:काल यदि दक्षिण स्वर चलता है तो वह दिन ठीक है पर तीन दिन सप्तमी, अष्टमी, नवमी को यदि बामस्वर चलता है तो वह ठीक निर्णय रखता है। इसके बाद फिर तीन दिन दशमी, एकादशी, द्वादशी इन दिनों में सूर्यस्वर चलता है याने दक्षिण नासिका से श्वास चलती है तो वह शुभ निर्णय रखता है। फिर त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या के दिनों में यदि बामस्वर चलता है तो वे जाननहार शुभ मानते हैं। शुक्लपक्ष में इससे उल्टी बात है। कृष्णपक्ष में शुरू के तीन दिनों में सूर्यस्वर चले, फिर यों तीन दिन बदलकर यह प्रात:काल इन स्वरों का निर्णय रखे, उससे दिन भर का शुभ अशुभ अथवा भविष्य का वे अनुमान करते हैं। यद्यपि ये बातें ज्ञानदृष्टि से, प्राणायामदृष्टि से बेहूदी लग रही हैं लेकिन जब इस छद्मस्थ अवस्था में, दुर्बल अवस्था में ज्ञान ही पराधीन बन रहा है, शरीर के अंग इंद्रिय और मन के निमित्त से उत्पन्न होता है तब उन्हीं इंद्रियों की नासिका के स्वर आदिक के भेद से ज्ञान में शुभ अशुभ का निर्णय कर लिया जाय तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। तो जब महेंद्र अथवा पृथ्वी नामक पवनमंडल चलता है तो वह शुभ माना गया है।


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