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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 142

From जैनकोष



एकाकित्वं प्रपन्नोऽस्मि यदाहं वीतविभ्रम:।

तदैव जंमसंबंध: स्वयंमेव विशीर्यते।।142।।

एकत्व की उपासना से जंमसंबंध का निवारण―जिस समय यह जीव भ्रमरहित होकर ऐसा चिंतन करता है कि मैं तो अकेला हूँ, मेरा यह चैतन्यस्वरूपस्वतंत्र है, ऐसी एकता को प्राप्त होता हुआ अपने में न माने कि अन्य कुछ भी मेरा है और दृढ़ निर्णय रखे कि मेरा मात्र मैं ही हूँ, मेरा जिम्मेदार मैं हूँ मेरी करतूत के अनुसार ही मुझे फल मिलता है और वह फल करतूत के साथ ही साथ तुरंत मिल जाता है। जैसा परिणाम किया वैसा सुख अथवा दु:ख अथवा आनंद तत्काल ही मेरे साथ लगा हुआ है, मैं उपाधिरहित अपने सत्त्व के कारण अपने स्वरूपमात्र हूँ, ऐसे एकत्व को मैं प्राप्त हुआ हूँ, ऐसी बात जब इस जीव के बनती है तब ही जन्म का संबंध स्वयमेव ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि संसार का संबंध तो मोह से है। यदि मोह दूर हो गया तो आप तो एक थे ही, अकेले थे ही। वही रह गए, फिर मोक्ष क्यों न होगा?

अपनी परिणति पर अपने भविष्य की निर्भरता―हम कैसे बनें, हमारा भविष्य कैसे सुधरे अथवा बिगड़े, कैसे बनेगा भविष्य, यह सब कुछ हमारे परिणामों पर आधारित है। यह सब यथार्थ है। जो लोग ऐसा न मानते हो कि हमको ईश्वर सुख अथवा दु:ख देता है तो जब उनसे यह प्रश्न करो कि सुख दु:ख जब प्रभु देता है तो इस जीव को वह सुख ही सुख क्यों नहीं देता, दु:ख क्यों देता है? तब वहाँ यह कहना पड़ता है कि यह जीव जैसे कर्म करता है उसे कर्म के अनुसार प्रभु सुख अथवा दु:ख देता है। तब इसमें ही तथ्य तो यही निकला कि चाहे किसी प्रकार हमको सुख अथवा दु:ख मिले, पर हम जैसे करनी करते हैं उसके अनुसार हमें सुख अथवा दु:ख प्राप्त होता है। संसार विडंबना में भी मैं अकेला ही बंधन में पड़ा हुआ हूँ और जब यथार्थस्वरूप जानकर इन विडंबनाओं से मुक्त होऊँगा तब भी यह मैं अकेला ही मुक्त होऊँगा। संसार की इन प्रवृत्तियों में भी यह जीव सर्वत्र अकेला ही है। सुख भोगे तो अकेला, दु:ख भोगे तो अकेला। मोह करे किसी से तो यह अकेला ही तो करता है। उस परिणति को दूसरा नहीं करता।

व्यवहार की असारता का निर्णय―भैया ! बहुत राग हो किसी से तो यह न समझिये कि उसका राग मुझमें हुआ है। यह समझिये कि मेरे प्रदेशों में मेरा राग परिणमन है और वह भी मुझसे राग करता है तो उसका राग परिणमन उसके प्रदेशों में है। सर्व जीव स्वयं अपने आपमें अपने आपका परिणमन किया करते हैं। कोई किसी का साथी नहीं है। कषाय से कषाय मिल गई लो मित्रता हो गयी, कषाय से कषाय न मिली तो शत्रुता हो गई। इस शत्रुता मित्रता का कोई ठेका नहीं है कि कब तक रहे? आज तो शत्रु है कहो कल मित्र बन जाये और आज मित्र है कहो कल शत्रु बन जाय। तो यह सब जगत विलक्षण है। यहाँ रमने योग्य कुछ नहीं है। जब एक स्वरूप स्वभाव को निरखें, उसमें ही परिणमन करें, उस ही घर में निवास करें, अपने ही ब्रह्मस्वरूप में मग्न होवें तो यही हमारी शरण है, इसके सिवाय अन्य जगह का भटकना यह कुछ भी शरण नहीं है। जब यह जीव भ्रमरहित होकर अपने इस कैवल्यस्वरूप को प्राप्त करता है बस उस ही समय से जन्ममरण का संबंध नष्ट होने लगता है और जन्ममरण से रहित हो जाता है। समस्त व्याधियों और चिंतावों की जड़ यह शरीर है। इस शरीर से भी रहित होकर यह जीव शाश्वत आनंदमय वर्तता रहता है। हमारे कल्याण की प्राप्ति इस एकत्व भावना से होती है।

एकत्व की उपादेयता का निर्णय―भैया ! एक ही निर्णय कर लो, हम आप सबको संकट से मिटाने में समर्थ एक एकत्व भावना है अर्थात् अपने आपका विशुद्ध अकेलापन है। शरीर से भी रहित और रागद्वेष आदिक से भी रहित केवल चैतन्यप्रकाशमात्र जहाँ मात्र जाननहार स्थिति है ऐसा विशुद्ध चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ, ऐसा केवल अपने को विचारें तो यह ही आनंद का उपाय है अन्य कुछ नहीं। अन्य बातों में कहीं लगते हो? सब धोखामय है, मायाजाल है। जैसे स्वप्न में देखी हुई सारी बातें झूठ हैं ऐसे ही वह दृश्यमान् सारा संसार झूठा है, असार है।

एकत्व के ग्रहण में संसरण का विच्छेद―सीधी सी बात देख लेना, बड़े-बड़े धनिक, बड़े-बड़े यशस्वी, बड़े-बड़े नायक क्षणमात्र में मरण को प्राप्त हुए और फिर उसके बाद यहाँ उनका क्या रहा? जहाँ जायेगा यह जीव वहाँ क्या बीतेगी? वह बात आगे की उनके साथ है। लेकिन यहाँ का सारा संबंध तो सारा विघट जायेगा। जब यह जीव मरण करता है तब तो स्पष्ट समझ में आ जाता है कि यह अकेला ही था, अकेला ही जन्मा था, अकेला ही मर गया। लेकिन जब तक जीवन था तब वह सर्वत्र अकेला ही अकेला था। मंदिर में आकर कुछ धर्मध्यान किया तो वहाँ भी इस अकेले ने अकेले में अकेले का काम किया। और यह जीव घर में जाकर पुत्रादिक को खिलाता हो और बड़े सुख साज वैभव को भोगता हुआ रह रहा हो वहाँ भी यह जीव केवल अपने में केवल अपनी ही कल्पनाओं से अपने लिए कर रहा है। इसके आगे वहाँ भी यह कुछ नहीं करता है। ऐसा एकत्व, ऐसा अकेलापन दृष्टि में आये और इसका सही रूप में श्रद्धान बने तो उसका जन्म मरण संसार का संबंध दूर हो जायेगा।


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