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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 143

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एक: स्पर्शी भवति विवुध: स्त्रीमुखांभोजभृंग:, एक: श्वाभ्रं पिबति कलिलं छिद्यमान: कृपाणै।

एक: क्रोधाद्यनलकलित: कर्म बंधाति विद्वान्, एक: सर्वावरणविगमे ज्ञानराज्य भुनक्ति।।143।।

जीव का अकेले अकेले संसरण―यह जीव आप ही अकेला स्वर्गी बनता है, देव बनता है और उस देवगति में जन्म लेकर अनेक देवांगनाओं के समागम में संगम में उनको निरख-निरखकर उनके मुख कमल में भ्रमर जैसा सेवक बनकर जो कुछ वहाँ चेष्टा करता है वह भी अकेला ही चेष्टा करता है। और फिर यह जन्म मरण करके मनुष्य अथवा पशु पक्षियों में जन्म लेता है तो वहाँ भी यह उस पर्याय के अनुकूल अपने को अकेला ही करता है। जो कुछ भी परिणमन करे अकेला ही परिणमन करता है। यों ही यह जीव जब नरकगति में उत्पन्न होता है तो वहाँ भी अन्य नारकियों के शस्त्रों द्वारा छिद-छिद कर नारकीय यातनाओं को भोगता है और दूसरे नारकी, मदिरा पूर्वभव में जिन्होंने पिया है उन्हें तप्त लोहरस पिलाते हैं, उनको उनके ही शरीर से जो कुछ भी निकला खून जैसा कुछ भी उसे ही कूटकर उनके मुख में देते हैं। नारकों में ऐसे कठिन दु:खों को भी यह जीव अकेला ही भोगता है, कोई दूसरा वहाँ साथी नहीं है।

क्रोध में अकेले का परिणमन―इस भव में भी क्रोध, मान, माया, लोभ की अग्नि से संतप्त होता हुआ यह जीव अकेला ही कर्मबंधन करता है जब कोई उमडता है तो उस क्रोध की स्थिति में जो इस पर गुजरती है, बेचैनी हो जाती है वे सब परिस्थिति इस अकेले को ही तो भोगनी पड़ती है। कैसा अज्ञान है? जिस पर क्रोध आता है उसका कुछ बिगाड़ हो जाए तो यह बड़ा अपने को सुखी अनुभव करता है। जैसे माँ बालक को गोद में लेकर चल रही है, दरवाजे से निकले और कोई किवाड़ों का खूट उस बालक के लग गया तो बालक रोने लगता है। उस समय माँ बालक को देखकर दो तमाचे किवाड़ में जड़ देती है, बालक का रोना शांत हो जाता है। अरे बालक, उस किवाड़ में दो थप्पड़ जड दिये तुझमें कौनसी बात आ गयी? लेकिन इस किवाड़ ने मुझे मारा था, लो मेरी माँ ने इसे पीट दिया, यह बात उस बालक के चित्त में आयी इससे उसका रोना बंद हो गया। यह जीव दूसरे का बिगाड़ निरखकर अपने को बड़ा सुख में मानता है। तीव्र कषाय में, अनंतानुबंधी भाव में ऐसी ही परिणतियाँ होती हैं। यों ही मान कषाय है।

मान, माया, लोभ में अकेले का परिणमन―जब तीव्र मानकषाय का जिसके उदय होता है वह दूसरे को नहीं देख सकता। दूसरे का अपमान हो, खुद की महत्ता बढ़े, ऐसी बात उसके मन में आती है और उस मान की अग्नि से जलकर यह जीव दु:खी रहता है। यों ही माया की अग्नि है, जिसमें जलाकर यह जीव अपने गुणों को खाक कर देता है, बरबाद कर देता है। लोभ की आग भी कम नहीं है। तृष्णा दाह में जलभुनकर यह जीव अपने आपके सारे गुणों को फूँक डालता हैं। यों कर्म बाँधा तो इस जीव ने अकेले ही कर्म बाँधा। सर्वत्र यह जीव अकेला है।

एकत्व के मिलन में धर्म का पालन―भैया ! अपने अकेलेपन को सोचो तो इससे शांति का मार्ग मिलेगा। अपने को किसी बाह्य विभाव से युक्त न निरखिये। इन चर्मचक्षुवों को खोलकर बाहर के पदार्थों को देखकर उनसे कुछ अपना महत्त्व आंकने लगे तो दु:ख ही दु:ख मिलेगा, वहाँ आनंद का नाम नहीं है। भाई धर्म करो? क्या धर्म करो? प्रभुपूजा करो, प्रभुस्मरण करो, आत्मा का ध्यान करो। यह ही धर्म करना है। जिन्होंने धर्म का मर्म ही कभी नहीं पहिचाना है उनके प्रभुपूजा में भी धर्म नहीं हो पाता। ध्यान, जाप वगैरह करने बैठे तो वहाँ भी धर्म नहीं हो पाता। और धर्मपालन करो इसका सीधा तो अर्थ है। अपने को सबसे न्यारा केवल चैतन्यस्वरूपमात्र निरखने लगो। इसही का नाम धर्मपालन है। क्योंकि धर्म से मुक्ति मिलती है, संसार के संकटों से छुटकारा मिलता है। संसार के दंद-फंदों से तो हम छूटना चाहें और संसार के दंद-फंदों से न्यारा होने का हम साहस न बनायें तो संकटों से छूट कैसे सकते हैं? जैसे जल में रहते हुए भी कमल जल से न्यारा है ऐसे ही इन रंगों में रहकर भी जीव अपना स्वरूप परिचय पाकर न्यारा ही समझे, इससे तो इस जीव का भला है, कल्याण है अन्यथा बाह्य वस्तुओं के मोह में तो इस जीव को आदि से अंत तक केवल दु:ख ही दु:ख मिलेगा।

विशुद्ध स्वरूप के आचरण में कल्याण―यह जीव संसार में जो सुख दु:ख सहता है वह सब यों ही अकेला ही सहता है और जब कभी समस्त बाह्य आभ्यंतर आवरण टूट जायें, इस लोक के स्वभावों को ढकने वाले कर्म दूर हो जायें, यों यह समस्त ज्ञानराज्य को भी भोगता है। वह भी अकेला ही भोगता है। अपना वास्तविक अकेलापन अपनी दृष्टि में रहे तो जीव को शांति और संतोष हो सकता है। एकत्व भावना के इस प्रकरण से हम अपने आपमें यह शिक्षा लें कि मुझे तो अपने को केवल अकेला निजस्वरूपमात्र अपने सत्त्व से जैसा है तैसा ही मानना है, इसमें ही कल्याण है, अन्य उपायों से शांति का मार्ग प्राप्त नहीं हो सकता।

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