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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1501

From जैनकोष



बहिर्भावानतिक्रम्य यस्यात्मन्यात्मनिश्चय:।

सोऽंतरात्मा मतस्तज्ज्ञैर्विभ्रमध्यांतभास्करै:।।1501।।

जगत में जितने आत्मा है उन आत्मावों में वे तीन तरह के मिलेंगे कोई बहिरात्मा है, कोई अंतरात्मा है और कोई परमात्मा है। अरहंत और सिद्ध भगवान ये तो परमात्मा हैं और मिथ्यादृष्टि जीव और दूसरे गुणस्थान के भी जीव और तीसरे गुणस्थान के भी, क्योंकि वे भी सम्यक्मिथ्यादृष्टि होते हैं। ये बहिरात्मा हैं। सम्यग्मिथ्यादृष्टि उन्हें कहते हैं जिनकी मिश्रदशा है। जैसे कोई मित्र कुदेव की पूजा अपने घर में करता आ रहा है, उसे कुछ उपदेश मिले, श्रद्धा पलटे, सच्चेदेव को मानने लगे, पर उसने अपने घर से भी अभी उस देव को हटाया नहीं है, ऐसी जो मिश्र हालत है, वे सम्यग्मिथ्यादृष्टि होते हैं। ये तो हुए बहिरात्मा जीव। चौथे गुणस्थान से लेकर 12 वें गुणस्थान तक अंतरात्मा हैं। इसमें गृहस्थ भी आ गए, ध्यानी मुनि भी आ गए। तो तीन प्रकार के आत्मा लोक में मिलते हैं। बहिरात्मा तो वे कहलाते हैं जिनको शरीर आदिक बाह्य पदार्थों में आत्मबुद्धि हुई कि यह मैं हूँ। यह शरीर है, मोही मैं हूँ, शरीर में जो इंद्रियाँ हैं सो ही मैं हूँ, शरीर का सुख ही मेरा सुख है, सब कुछ नाता शरीर से मानते हैं वे बहिरात्मा हैं। कोई घर के धन से नाता मानते कि मेरा है। तो वे तो बहिरात्मा हैं ही, क्योंकि वे तो बिल्कुल ही भिन्न क्षेत्र में स्थित हैं। अंतरात्मा कौन कहलाते हैं? इसका स्वरूप इस श्लोक में कहते हैं कि जो पुरुष बाह्य भावों का तो उल्लंघन करें और आत्मा में आत्मा का निश्चय करें वे अंतरात्मा कहलाते हैं। सो वह अंतरात्मा विभ्रमरूपी अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य की किरणों के समान है। जिस प्रकार घनांधकार को सूर्य की किरणें मिटा देती है, इसी प्रकार विभ्रमांधकार को अंतरात्मा पुरुष अपनी स्वरूपदृष्टि से मिटा देते हैं।

ऐसे परमसूर्य की तरह ज्ञानी पुरुषों को बताया है कि जो अपने आपमें अपने आपका निश्चय करें सो अंतरात्मा हैं। सब ओर से हटकर केवल अपने आपमें अपने को निरख लें तो वे जीव सब दु:खों से छूट जाते हैं। तो दु:ख तो इतना ही है कि किसी बाहरी पदार्थ की कुछ हालत देखकर खुद दु:खी हो जाते। इतना ही तो दु:ख है। धन कम हुआ जानकर दु:खी हो जाय अथवा इष्टवियोग हो गया, अनिष्ट संयोग हो गया तो उसमें दु:खी किसने किया? अरे वह दु:ख केवल कल्पनाभर का है। जब यह विश्वास हो जाता कि मैं सबसे निराला केवल ज्ञानमात्र हूँ, मेरा अन्य से कोई संबंध नहीं, अन्य पदार्थ चाहे किसी भी प्रकार परिणमे, मैं उनसे बिल्कुल स्वतंत्र हूँ, ऐसा अपने आप, मैं अपने आपमें विराजमान रहता हूँ, ऐसा जब भान होता है तब फिर दु:ख नहीं होता, क्योंकि बाहरी पदार्थ चाहे जैसे परिणमें, वे तो बाह्य हैं, उनसे मेरा कोई सुधार बिगाड़ नहीं है। यह दृष्टि ज्ञानी पुरुष को हो जाती है। तो अंतरात्मा वह है जो बाह्य पदार्थों का लगाव न रखे और ज्ञानस्वरूपमात्र अपने आपको पहिचाने वह अंतरात्मा है।


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