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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1502

From जैनकोष



निर्लेपो निष्कल: शुद्धो निष्पंनोऽत्यंतनिर्वृत:।

निर्विकल्पश्च शुद्धात्मा परमात्मेति वर्णित:।।1502।।

परमात्मा कौन है जो निर्लेप हो, जिसमें कोई मल कलंक का लेप न हो। शरीररहित है, कलंकरहित है, सिद्ध है, संसार के दु:खों से अत्यंत परे हो गया है। जिसके कोई प्रकार का विकल्प तरंग न हो, ऐसा जो सिद्ध आत्मा है वह परमात्मा कहलाता है। शरीरसहित परमात्मा अरहंत भगवान है और शरीररहित परमात्मा सिद्ध भगवान हैं। अब उस परमात्मा का अनुभव करने के लिए ऐसा सोचें कि जो कुछ भी आत्मा है उस आत्मा के साथ एक तो शरीर का संबंध चिपटा है, रागादिक भाव लगे हैं। ये सब हट जायें, कर्मकलंक दूर हों, रागादिक भाव दूर हों, उस समय यह आत्मा किस स्थिति में रहता है उस स्थिति का अनुमान करके परमात्मा का स्वरूप जाना जाता है। परमात्मा का अर्थ है जो परम अर्थात् उत्कृष्ट आत्मा हो। उत्कृष्टता दो बातों से होती है― एक तो जितने गुण हों वे सब गुण पूरे प्रकट हों। और दूसरे दोष एक न हों। जहाँ गुण भी हों और दोष भी हों वहाँ उत्कृष्टता नहीं है। अरहंत भगवान और सिद्ध में ज्ञानादिक गुण भी पूरे हैं और रागादिक दोष रंच नहीं हैं। उनको अगर संक्षेप में समझना है तो यों कहो कि वीतराग सर्वज्ञ है, इससे परमात्मा की सब विशेषता एक साथ झलक जाती है। प्रभु वीतराग है, रागरहित है।जहाँ राग नहीं वहाँ द्वेष कैसे रह सकता है? क्योंकि जितने द्वेष हैं वे सब राग के आधार पर हैं। किसी का घर वैभव आदिक में राग है, उसके प्रति कोई बाधक बने तो उससे वह द्वेष करने लगता है। तो राग के आधार पर द्वेष है। मूल में राग ही इस जीव का कलंक है और राग की पीड़ा बनी हुई है मोह से। मोह न हो तो यह राग न रहेगा और फिर अपने आप दूर हो जायगा। जैसे पेड़ में जड़ न रहे तो वह पेड़ सूख जायगा, इसी प्रकार जिस जीव में मोह न रहेगा उसमें राग भी न रहेगा, वह भी सूख जायगा। तो द्वेष की जड़ हुआ राग और राग की जड़ हुआ मोह। भगवान सर्वज्ञ वीतराग हैं, रागद्वेषमोह आदिक से अलग हैं, कोई कलंक नहीं हैं, सर्वज्ञ हैं। लोकालोक में जितने भी सत् हैं वे सब सर्वज्ञ के द्वारा ज्ञेय हैं।

अब सर्वज्ञ क्यों सबको जानते हैं इस विषय में सोचें। एक तो यह बात समझना है। दूसरे यह बात समझना है कि जब उन सर्वज्ञदेव के इंद्रियाँ ही नहीं रही तो वे जान कैसे लेते हैं? पहिली बात का तो उत्तर यह है कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है। आत्मा का स्वरूप ही ऐसा है कि वह निरंतर जानता रहे। जानने से कभी यह आत्मा विराम नहीं लेता। अर्थात् जिसका जानन का काम है और जानन का कोई आवरण है नहीं तो उस जानन की सीमा नहीं रह सकती। जैसे हम आँखों से देखते हैं, जानते हैं चार छ: मील की। आगे की नहीं जान पाते, क्योंकि इंद्रियों का आवरण लगा हुआ है। जितनी सामर्थ्य प्रकट है वहाँ तक तो ज्ञान हुआ और जितनी सामर्थ्य दबी है उतनी का फिर ज्ञान नहीं होता। जिसके इंद्रियाँ ही नहीं रही वह तो समस्त विश्व को जान लेगा। जैसे एक कमरे में पुरुष बैठा है, उसमें चार-छ: खिड़की लगी हैं तो वह बाहर की बात खिड़कियों से देख सकेगा, यों न देख सकेगा, क्योंकि भींत का आवरण पड़ा हुआ है। खिड़कियों से बाहर की बात देख ली जाती है। कदाचित् वह यह कल्पनाएँ करने लगे कि यह मकान गिर जायगा तो ये खिड़कियाँ भी गिर जायेंगी, फिर हम कैसे देखेंगे, ऐसा कोई पुरुष सोचने लगे तो क्या यह ठीक है? अभी हम खिड़कियों से देख रहे हैं और यह भींत ही गिर जाय फिर हम कैसे देख सकेंगे, ऐसा कोई कहे तो इसे कौन ठीक कहेगा? अरे खिड़कियाँ खत्म हो जायेंगी तब तो फिर और ज्यादा दिखेगा। ये इंद्रियाँ खिड़कियाँ हैं, यह सब शरीर भींत की तरह है इसके अंदर रहने वाला जो दृष्टा है वह इन खिड़कियों के द्वारा बाहरी बातें देखता है। खिड़कियों से बाहर ही तो दिख रहा है। इन इंद्रियों से कोई, भीतर की बात तो नहीं देख सकता। बाहर में ये इंद्रियाँ ही न रहें, यह शरीर ही न रहे, कर्मकलंक ही न रहे तो क्या उसे अड़चन आयगी कि मैं नहीं देख सकता? वह तो सर्वचक्षु हो जाता है। जब शरीर है तो दो चक्षु वाला है और जब सर्वज्ञ है तो वह सर्वचक्षु वाला हो जाता है। उस केवलज्ञान के द्वारा जगत के चराचर समस्त पदार्थों को जान लेते हैं और एक साथ जान लेते हैं। वीतराग हो, सर्वज्ञ हो वह परमात्मा है। जो निष्कलंक हो और परिपूर्ण गुण वाला हो वह हमारा भगवान है। ऐसा परमात्मा बनना इस आत्मा का ही काम है। जो आज छोटी स्थिति में है आत्मा वह अपना उपाय बनाये और ऐसी स्थिति वीतराग सर्वज्ञ की स्थिति में आ जाय तो इसमें कोई संदेह नहीं है। यों तीन प्रकार के लोक में आत्मा होते हैं। अपूर्व सुखी है परमात्मा, सुख के मार्ग में आंशिक सुखी है, अंतरात्मा और बहिरात्मा सुखी नहीं है। उनका जो भी इंद्रियजंय सुख है वह भी दु:ख ही है। लोक में जो सुख माने जाते हैं― धन, धाम तथा खानपान आदिक के, वे सब अशांति से भरे हुए हैं। इन सुखों के भागने से शांति नहीं प्राप्त होती है। कोई भी पुरुष शांतचित्त होकर भोजन नहीं करता, अशांति ही बनी रहती है। पूर्ण शांति तो भगवान अरहंत सिद्ध हैं। जो शांति के मार्ग में लगे हुए हैं ऐसे होते हैं अंतरात्मा। और जिन्हें शांति से भेंट नहीं है, बाह्यपदार्थों में ही अपना उपयोग फँसाये रहते हैं वे कहलाते हैं बहिरात्मा।


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