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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1541

From जैनकोष



पृथगित्थं न मां वेत्ति यस्तनोर्वीतविभ्रम:।

कुर्वन्नपि तपस्तीव्रं न स मुच्येत बंधनै:।।1541।।

जो भ्रमरहित मुनि है सो आत्मा को देह से भिन्न यदि नहीं मानता, तो चाहे तपश्चरण कितना ही कर रहे, पर कर्मबंधन से नहीं छूट सकते। बाहरी पदार्थों में उपयोग लगे तो उससे बंधन होता है। अब बंधन का काम कर रहा है। मुनि तो वह चाहे कितना ही घोर तपश्चरण कर ले, उपवास, ऊनोदर, रसों का छोड़ना आदिक बड़े कठिन तपश्चरण कर ले, धूप में बैठकर अथवा नदी किनारे बैठकर तपश्चरण कर रहे, कितने ही कठिन तपश्चरण करे पर मोक्ष का द्वार तो आत्मा का आत्मदृष्टि करनाहै, वह हुई नहीं जिस साधु को वह साधु मुक्ति के पद को कहाँ से प्राप्त हो? संसार के बंधनों से छुटकारा कैसे प्राप्त हो? अपने स्वरूप को जाने मुनि और यह भी निर्णय रखता हो कि मेरे आत्मा का शरण, मेरे आत्मतत्त्व का अनुभव स्वयं है तो समझिये कि मुझे कर्मबंधन से छुटकारा प्राप्त हुआ, क्योंकि यह जीव एक ज्ञानकल्पना से ही तो बंधा है। छूटेगा तो ज्ञान की उस प्रकार की कल्पना मिटा दे तो छूटेगा और दूसरा इसके छूटने का कोई उपाय नहीं है। बाहरी देह के तपश्चरण से तो छुटाकर नहीं मिलता, पर कर्मों के आने का तरीका तो योग है। आस्रव है योग और आस्रव मिटाये नहीं, बाहर में कितना ही खेदखिन्न हो, बड़े-बड़े तपश्चरण करके, फिर भी इस आत्मा को मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, किंतु मुक्ति का उपाय है भेदविज्ञान। उस भेदविज्ञान का मार्ग इसे नहीं मिला। तो जिसे धर्मपालन करना हो, बहुत सुगम उपाय है, किसी भी जगह स्थित हों, अपने में आपके स्वरूप को देखें। बाह्य साधनों को अपना मानते हैं। आत्मा का जो सत्य स्वरूप है उसे तो ग्रहण ही नहीं कर पाता। तो अज्ञानी की वृत्ति है बाह्य तत्त्व को अपनाना। यह वृत्ति अपनी नहीं छोड़ता। गृहस्थ था तो गृहस्थी के समागम को अपनाया करता था। अब साधु हुआ है तो वहाँ का जो भेष है, तपश्चरण है, व्रत ग्रहण है उनको अपनाता है और उनको अपनाकर मानता है कि यह मैं हूँ। में मुनि हूँ, तपस्वी हूँ, ज्ञानी हूँ, धर्मात्मा हूँ, मैं मोक्षमार्गी हूँ― इस प्रकार मैं मैं लगाये रहता है धर्म के बाह्यसाधनों से, इस कारण धर्म के नाम पर बाहरी तपश्चरण करते हुए भी यह जीव कर्मों से मुक्त नहीं होता।


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