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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1542

From जैनकोष



स्वपरांतविज्ञानसुधास्पंदाभिनंदित:।

खिद्यते न तप: कुर्वन्नपि क्लेशै: शरीरजै:।।1542।।

भेदविज्ञान आत्मा और पर के अंतर्भेदरूप, विज्ञानरूप अमृत के वेग में आनंदरूप होता हुआ, तप करता हुआ भी शरीर से उत्पन्न खेद से खिन्न नहीं होता। तो ज्ञानी पुरुष बाहर में कितना ही घोर तपश्चरण करे उस तपश्चरण से इसे खेद नहीं होता क्योंकि अंदर में अपने आत्मस्वरूप में लीन होकर अमृत का स्वाद लिया करते हैं। तो ऐसे अमूर्त तत्त्व में निज तत्त्व को रंच भी खेद नहीं होता है। खेद हो तो कोई खेदमयी कल्पना बने तो होता है। ज्ञानी पुरुष के अंतरंग में अमृत का स्पंदन होता है, सुंदर अमृत झड़ता रहता है उसी से तृप्त है तो उस तृप्ति में इतना मग्न है, ऐसा अपने आपके स्वरूप में अभेद होता है कि बाह्य में शरीर आदिक का घोर कष्ट भी हो रहा हो, बड़ा तपश्चरण चल रहा हो, जिसे अज्ञानी देखकर एक अपना धैर्य छोड दे, अहो ! कितना कठिन क्लेश किया जा रहा है, पर ज्ञानी को तो क्लेश का अनुभव भी नहीं। वहाँ तो आनंदरस में तृप्त है क्योंकि उसकी दृष्टि में कोई विशुद्ध ज्ञानानंद स्वरूप आत्मा है। यह मात्र मैं हूँ, सो उस आत्मा के अनुभव के प्रसाद से ऐसे आनंदरस में छक रहे हैं कि बाह्य में घोर तपश्चरण भी कर रहे हैं तो भी उनसे रंच मात्र भी खेद को प्राप्त नहीं होता। अब सोच लीजिए अज्ञानी जीव तो विभूतियों के बीच में रहकर, उन्हें अपनी मानकर अपने को दु:खी कर डालता है। यहाँ ज्ञानी जनों को देखो― बड़े घोर तपश्चरणजो सामान्यजनों से न किये जायें, उन तपश्चरणों को करके भी खेदखिन्न नहीं होते, किंतु स्वात्मीय आनंद के अनुभवरस से तृप्त होते हुए आनंदविभोर रहते हैं। अज्ञानी जनों को ऐसा लगता कि ये बड़ा कठिन परिश्रम कर रहे हैं, पर ज्ञानी जन तो अपने आत्मीय आनंदरस में तृप्त ही रहते हैं।




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