• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1564

From जैनकोष



निरुद्धज्योतिरज्ञोऽंत: स्वतोऽन्यत्रैव तुष्यति।

तुष्यत्यात्मनि विज्ञानी बहिर्विगतविभ्रम:।।1564।।

अज्ञानी तो अपने से भिन्न परवस्तुवों में ही खुश रहते हैं क्योंकि अज्ञानी का अंतरंग ज्ञानप्रकाश रुक गया है। लेकिन ज्ञानी पुरुष अपने आत्मा में ही संतुष्ट रहते हैं, क्योंकि उनका बाह्यपदार्थों के विषयक भ्रम नष्ट हो चुका है। ज्ञानी और अज्ञानी के रमने का अंतर बताया जा रहा है। अज्ञानी को चूंकि अपने को कुछ पता नहीं है, जो परमविश्राम का स्थान है, आनंद का धाम है, जहाँ उपयोग जाय और रमे तो एक विशुद्ध आनंद का ही अनुभव मिले। ऐसे निज आत्मतत्त्व का उसे परिचय नहीं है तो वह रमे कहाँ? अनादि से बाह्यवस्तुवों का परिचय बना हुआ है और इन इंद्रियों के द्वार से उन बाह्यवस्तुवों के प्रसंग में यह सुख मानता चला आया है। इस कारण यह अज्ञानी जीव बाह्यपदार्थों में ही रमता है, वहाँ ही संतुष्ट होता है। सो देख लो―आजकल के मनुष्य लोगों में यह ही प्रवृत्ति देखी जा रही है―इन वैभवों को बढ़ाना, विषयसाधन बढ़ाना, उनमें ही खुश रहना, उनमें ही संतुष्ट रहना। यह वृत्ति बना रखी है। किंतु ज्ञानीपुरुष का बाह्य में कहीं मन नहीं लगता, कहीं दिल ही नहीं थमता। कहाँ रमे? सब असार हैं, भिन्न हैं, उनसे अपना कुछ संबंध नहीं है, बल्कि उन बाह्यपदार्थों को अपना विषय बनाकर यह जीव अपना अनर्थ कर रहा है। इसको वहाँ कोई तत्त्व नहीं नजर आता। अतएव ज्ञानी जीव बाह्यपदार्थों में नहीं रमता किंतु वह अपना ही अंतरंग जो कारणपरमात्मस्वरूप है उस ही तत्त्व में रमता है यह ज्ञानी। और अज्ञानी तो बाह्यपदार्थों में ही खुश रहता है। अज्ञानी का परिणाम तो उसका संसार बढ़ाने वाला है और ज्ञानी का परिणाम उसका संसार छूटाने वाला है। यों अज्ञानी और ज्ञानी पुरुष में महान अंतर है। एक कल्याण के मार्ग पर है और एक अकल्याण के मार्ग पर है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1564&oldid=83489"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki