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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 157

From जैनकोष



असृग्मांसवसाकीर्ण शीर्ण कीकसपंजरम्।

शिरानद्धं च दुर्गंधं क शरीरं प्रशस्यते।।157।।

शरीर की अशुचिता व उसका मूल कारण―यह शरीर रुधिर मांस चर्बी से भरा हुआ सड़ रहा है, शीर्ण हो रहा है। कुछ अन्य सारभूत चीज हो फिर उसमें कुछ थोड़ा असार पड़ा हुआ हो ऐसा भी तो नहीं है। जो कुछ भी है शरीर में वह सबका सब अशुचि पदार्थों से भरपूर है, स्वयं ही अशुचि है। इस प्रसंग में एक बात यह भी समझियेगा कि ऐसे अशुचि शरीर को पाने का कारण क्या हुआ? शरीर तो अशुचि लग रहा है, ठीक है, पर मूल में अशुचि तत्त्व क्या है? तो मूल में अशुचि पदार्थ शरीर नहीं, किंतु मोह है। लोक में सबसे गंदी चीज क्या है? शायद नालियां होंगी अथवा ये संडास, मलमूत्र वगैरह होंगे? अरे सबसे गंदी चीज है मोह।

अस्पृश्यता की प्रसिद्धि में लोकप्रथा―लोक में ऐसी प्रथा है कि किसी बालक का पैर नाली में गिर जाय, विष्टा में पड़ जाय तो और बालक उसे छूते नहीं हैं, वह अस्पृश्य हो गया। वह नहाये, सब कपड़े बदले तब जाकर वह छूने योग्य होता है। वह लड़का किसी दूसरे बालकों को छू ले तो उस दूसरे बालक को भी लोग नहीं छूते। वह भी अस्पृश्य हो गया और वह दूसरा तीसरे को छू ले तो वह भी अस्पृश्य हो गया, इसी प्रकार तीसरा चौथे को चौथा पांचवे को छू ले तो यों सभी अस्पृश्य माने जाते हैं। पर ये बालक जो अस्पृश्य हुए उसका आधार क्या, मूल बात क्या होती है? जब इसका विवरण पेश किया जाय तो यही तो कहेंगे कि सबसे मूल में छूत वह लड़का है जिसके पैर विष्टा में पड़ा।

देह की अस्पृश्यता के मूल कारण पर विचार―अब जरा यहाँ भी अछूत की जांच कीजिए, कौन है अछूत? इन गंदी नालियों की कोई छींट पड़ जाय तो लोग उसे अशुचि मानते, पैर भिड़ जाय तो पूरा नहाना होता है। तो क्या वे नालियां गंदी हुई? अरे उन नालियों में, उन संडासों में जो अपवित्र चीजें पडी हैं वे चीजें कहाँ से निकली हैं? इस शरीर से ही तो निकली हैं और यह शरीर कैसे बना है? अरे जीव ने इन शरीरों पर कब्जा किया जन्म समय तो उससे फिर यह शरीर बढ़ता गया तो कब्जा किया जन्म समय तो उससे फिर यह शरीर बढ़ता गया। तो नालियों के अशुचि होने का मूल मिला शरीर और शरीर का बंधन का मूल मिला मोही जीव और इस मोही जीव में कुछ जीवत्व तो अशुचि की चीज नहीं है, किंतु उसमें जो मोह बसा है वह अशुचि है। तो जो कुछ भी ये शरीरादिक, मलमूत्र आदिक अशुचि पदार्थ लोक में माने हैं इन सबका मूल है मोह। जीव में मोह न होता तो यह जीव शरीरों को ग्रहण नहीं करता। यह जीव शरीर को ग्रहण नहीं करता तो ये वर्गणायें ये आहार वर्गणायें अपने शुद्ध रूप में थी ही, उनमें विकार क्यों आता? शरीर की वर्गणाओं में विकार आया तो आज यह रूप बना। इसमें मल आदिक झरने लगे तो उन मल आदिक से भी अस्पृश्य कौन है? जिसका संबंध पाकर ये गंदी नालियां अशुद्ध कहलाने लगी वह है अशुद्ध मोह। तो इन सब गंदगियों का मूल हेतु है मोह। तो सबसे अधिक गंदी चीज मोह रही। ये विष्टा मलमूत्र आदिक नहीं रहे।

प्रयोजनवश शुचि अशुचि का वितर्क―अब और खुले दिल से इसका निर्णय करें ये मांस विष्टा आदिक पदार्थ जैसे हैं, हैं, ठीक हैं, किंतु इस जीव को अपनी विषयशुचि के कारण देह सुहावना लगता है और कभी प्रकट अशुचि दिखने से इन्हें बाधा जगती है इसलिए इन्हें अपवित्र माना है, इन जीवों को सुहाती है सुगंध और मिल रही है दुर्गंध, तो विषयशुचि के विरुद्ध बात होने से ये मोही जीव इन मल आदिक को अशुचि मान रहे हैं, पर उस वस्तु की ओर से ही देखो तो वह तो जो है सो है। उसमें क्या शुचिपना क्या अशुचिपना? वह चीज है, पौद्गलिक है। वहाँ पुद्गल का कुछ बिगाड़ नहीं है। किंतु जरा अपने में तो देखिये यह मोह महा अशुचि है जिसने ज्ञानानंद के धाम इस परमात्मस्वरूप को बिल्कुल ढक दिया है, इस ओर इसकी सुध भी नहीं हो पाती और विकल्पजालों में यह बढ़ता चला जा रहा है, ये सब मोह के कारण ही तो है, तो मोह है गंदा मूल में, लोकव्यवहार में गंदे माने जाने वाले पदार्थ कुछ गंदे नहीं हैं।

अशुचिभावना का प्रयोजन―भैया ! मोह ही तीव्र गंदा है। बात यों है, फिर भी अशुचि भावना में शरीर की अपवित्रता का वर्णन चल रहा है, वह भी एक वैराग्य उत्पन्न कराने के लिए है। मोही जीवों की प्रति इस शरीर से अत्यंत अधिक है। तब पाये हुए शरीर से और दूसरें जीवों के शरीर से इसे प्रीति जगी है, यह प्रीति न जगे ऐसा उपाय करने में इस शरीर की अशुचिता का चिंतन करना चाहिए। यह शरीर हाड़ों का पंजर है। किसी अत्यंत दुर्बल पुरुष में जहाँ हड्डी पसलियाँ खूब स्पष्ट सी नजर आती हैं उसे देखकर तो कुछ-कुछ समझ में आ जाता है कि हाड़ों का पंजर है। केवल हड्डी की फोटो ले ली जाय तो उसमें पंजर दिखता है। और कागजों पर चित्रकारी कराकर केवल हड्डियों का ढांचा बनाकर खड़ा कर दिया जाय तो वहाँ पर भी जँचता है कि यह हाड़ों का अस्थिपंजर है।

अस्थिपिंजर के प्रति कामी की कामना―मोही जीव जिस शरीर में रति करते हैं वह शरीर क्या है? हाडों का पिंजर है। उन हाडों के ऊपर मांस और चाम चिपके हुए हैं जिससे इन हाडों की सही शक्ल नजर में नहीं आती, लेकिन जो मांस चाम वगैरह चिपके हैं वे सब भी अशुचि हैं। शुचिता का रंच भी नाम नहीं है। काम के प्रसंग में जब इस जीव के मैथुन संज्ञा का उदय तीव्रता को धारण करता है तो इस जीव को लोक में सबसे अधिक सारभूत यह शरीर ही जंचा करता है। यह उसके तीव्र पाप का उदय है। अश्रद्धा, मिथ्याश्रद्धान, अविवेक, बेहोशी इनसे बढकर भी कुछ और महापाप होता है क्या?

देह की अशुचिता ढकने के लिए साज श्रृंगार―यह शरीर महा अपवित्र है, नसाजाल से बँधा हुआ है। नसाजाल भी किसी किसी के शरीर में बहुत स्पष्ट नजर आने लगते हैं। चाम के भीतर रहकर भी नीली-नीली रस्सी जैसा बंधन इस शरीर पर पड़ा हुआ दिखता है और यह शरीर अति दुर्गंधित है तभी तो इसे इत्र फुलेल चाहिए, क्योंकि शरीर की दुर्गंधता तो ढकना है और इस शरीर को सजाने के लिए बड़े सुहावने कपड़े चाहियें, क्योंकि इस शरीर की पोल को ढांकना है। महा गंदा शरीर है, अशुचि पदार्थों को बहाने वाले ऐसे शरीर में मोही जीवों की रुचि जगती है।

अशुचि शरीर के प्रति हितमय उपयोग―भैया ! है यह गंदा शरीर, किंतु इस गंदगी का उपयोग वैराग्य के लिए करना चाहिए था, पर जिसके ज्ञाननेत्र फूट गए हैं ऐसे मोही पुरुष इस अपवित्र शरीर का उपयोग सही दिशा में नहीं कर पाते हैं। वे तो विषयसाधनों में इस शरीर को लगा देते हैं। एक कवि की कल्पना में मान लो इन कर्मों ने तो हम आप पर दया करके ऐसा अपवित्र शरीर दिया है। कहीं यह देवों जैसा शरीर पा लेता तो इसे वैराग्य का कहाँ अवसर आता? यह गंदा शरीर मिला है तो इससे वैराग्य की ओर प्रेरणा मिलती है। तो मिला तो शरीर एक वैराग्य उत्पन्न करने के लिए, किंतु यह शरीरी ऐसे अपवित्र शरीर से भी राग का काम करता है। ऐसा यह दुर्गंधित शरीर क्या कहीं प्रशंसा के योग्य है? यह तो सर्वत्र निंद्य ही दिखता है, ऐसे शरीर में रति मत कर। और अपने आपमें बसे हुए पवित्र चैतन्यभाव का अवलंबन ले।


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