• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1608

From जैनकोष



श्रीमत्सर्वज्ञदेवोक्तं श्रुतुज्ञानं च र्निमलम्।

शब्दार्थनिचितं चित्रमत्र चिंत्यमविप्लुतम्।।1608।।

सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष आज्ञाविचय धर्मध्यान में ऐसा चिंतन करता हे कि सर्वज्ञदेव के द्वारा कहा गया निर्मल और शब्द अर्थ से परिपूर्ण नाना प्रकार का विधिश्रुत है। श्रुतज्ञान अंग पूर्ण रूप में जो आया है वह मूल में तो भगवान की दिव्यध्वनि से निकला है, उस दिव्यध्वनि को सुनकर गणधर देवों ने उसका प्रतिपादन किया, फिर मुनिजनों ने, आचार्यजनों ने उसे सुनकर उसका प्रतिपादन किया। तो यह श्रुतज्ञान सर्वकल्याणभूत है, ऐसा ज्ञानी पुरुष चिंतन करता है। अब श्रुतज्ञान क्याहै? उसका वर्णन करते हैं।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1608&oldid=83537"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki