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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1609

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परिस्फुरति यत्रैतद् विश्वविद्याकदंबकं।

द्रव्यभावभिदा तद्धि शब्दार्थज्योतिरग्रिमम्।।1609।।

श्रुतज्ञान दो प्रकार का है―द्रव्यश्रुत और भावश्रुत। द्रव्यश्रुत अंगपूर्व रूप जो रचना है वह है। शास्त्र हैं, अक्षर हैं ये भी द्रव्यश्रुत हैं, और इनका अध्ययन करके अथवा सुन करके जो ज्ञान बनता है वह भावश्रुत है अथवा अंतरंग का जो ज्ञान है वह है भावश्रुत और जो शब्दों की रचना है वह है द्रव्यश्रुत। तो दो प्रकार का श्रुतज्ञान होता है―द्रव्यश्रुत और भावश्रुत। द्रव्यश्रुत में और भावश्रुत में शब्दों का प्रकाश है, शब्द और अर्थ का प्रकाश है श्रुतज्ञान और समस्त प्रकार की विद्यावों का समूह है। जितनी विद्याएँ हैं, जितने ज्ञान हैं सब श्रुतज्ञान हैं। जितने एकांत मत हो गए हैं, जितने धर्म प्रचलित हो गए हैं उन सबकी पूरी-पूरी बात श्रुतज्ञान में मिलेगी, पर मिलेगी दो ढंगों से। इस श्रुतज्ञान में पाप का, प्रमेय का, धर्म का, अधर्म का सभी का वर्णन हे। ऐसा कोई ज्ञान नहीं जो श्रुतज्ञान में न आया हो। इसलिए श्रुतज्ञान और केवलज्ञान को आचार्य बराबर का बताते हैं। किसी दृष्टि से श्रुतज्ञान भी संकेतरूप में समस्त विश्व को जान जाता है। जहाँ यह जान लिया कि समस्त विश्व उत्पादव्ययधौव्यात्मक है, एक-एक द्रव्य जाने वह बात अलग है मगर चिन्ह रूप में सारा विश्व जान लिया गया है। द्रव्यश्रुत में शब्द हैं और भावश्रुत में ज्ञान है। जो ज्ञान बना वह भावश्रुत है। जो द्रव्य हैं शब्द और शास्त्रादि वे द्रव्यश्रुत हैं। अक्षरों को कागज में लिख दिया तो वह भी द्रव्यश्रुत है। इस प्रकार द्रव्य का समस्त वर्णन, भावश्रुत का समस्त वर्णन जो मिलाहै वह सर्वज्ञदेव की ध्वनि से निकला है। तो सर्वज्ञदेव की ऐसी आज्ञा है ऐसा चार अनुयोगों में मानाहै। यद्यपि यह ज्ञानी युक्ति और अनुभव से विचारता है पर मानता वह यह है कि यह भी सर्वज्ञदेव की आज्ञा है।


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