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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1650

From जैनकोष



ज्ञानावृतिकरं कर्म पंचभेदं प्रपंचितम।

निरुद्धं येन जीवानां मतिज्ञानादिपंचकम्।।1650।।

जीव के साथ जो उपाधि लगी है उस उपाधि में 8 प्रकार की प्रकृतियाँ पड़ी हुई हैं। 8 प्रकृतियाँ कहो चाहे 8 कर्म कहो, जीव के साथ 8 प्रकार के कर्म लगे हैं। यह तो युक्ति ही बतलाती हे कि कोई पदार्थ विषम परिणमता है तो उसके साथ कोई विरुद्ध चीज लगी हुई है। जैसे पानी कुछ गरम हुआ, कुछ पानी ज्यादा गरम हुआ तो उस पानी में विषमता है किसी पदार्थ का समागम होने से, अग्नि के संसर्ग से। तो जीव में जो स्वभाव के प्रतिकूल परिणमन चल रहा है उससे यह समझना है कि कोई विरुद्ध चीज लगी हुई है, वह है कर्म, चाहे कुछ भी नाम रख लो। जीव चेतन है तो उपाधि अचेतन होगी। जीव सूक्ष्म है तो उपाधि स्थूल होगी। सिद्धांत ने उसका नाम अस्तिकाय रखा है। मूल प्रकृतियाँ8 हैं। उनमें प्रथम है ज्ञानावरण कर्म। ज्ञानावरण कर्म उसे कहते हैं कि जिसके उदय में आत्मा में ज्ञान का प्रकाश न हो सके। इसमें आवरण शब्द बोलाहै। जो ज्ञान का आवरण करे सो ज्ञानावरण है। इतना सोचना चाहिए कि आत्मा में ज्ञान मौजूद है तो आवरण नहीं कोई कर सकता और नहीं मौजूद है ज्ञान तो फिर आवरण उसके साथ यह लगना चाहिए कि शक्तिरूप से ज्ञान है, उसका विकास नहीं हो सकता। ज्ञानावरण कर्म के उदय में आत्मा में ज्ञान का विकास नहीं होता। यह सब जानने की इसलिए जरूरत है कि संसार के जीव बाहरी पदार्थों के संग्रह विग्रह में लगे रहते हैं और उसमें ही अपना हित मानते हैं, बाहर में इष्ट अनिष्ट बुद्धि करने में अपना हित समझते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि ये तो एक विनाशीक बातें हैं इनसे आत्मा का कुछ संबंध नहीं है। साथ जो कर्म लगे हुए हैं सो वे कर्म कैसे दूर हों―इसका प्रयत्न करना चाहिए। ये संसारी जीव जो बाहरी पदार्थों की व्यवस्था बनाने में लगे रहा करते हैं उससे पूरा न पड़ेगा।

जीव के साथ कर्म लगे हैं और मरने पर शरीर तो यही रह जाता है पर कर्म साथ जाते हैं। हर एक कोई कहते हैं कि जीव ने जो कर्म किया है वे कर्म जीव के साथ जाते हैं। मगर कर्म क्या चीज है जो साथ जाते हैं? इसका खुला जैनशासन के अतिरिक्त कहीं न मिलेगा। ये कार्माण वर्गणा जाति के पौद्गलिक स्कंध हैं और जीव के साथ एक क्षेत्रावगाह होकर बंध गए हैं। जब जीव जाता है तो जीव के साथ ये कर्म भी जाते हैं। लोग यह भी मानते हैं कि जीव के मरने पर याने शरीर के छूटने पर स्थूल शरीर तो यही पड़ा रहता है और सूक्ष्म शरीर जीव के साथ जाता है। वह सूक्ष्म शरीर भी क्याहै उसे जैनशासन ने स्पष्ट बताया है―एक तो कर्म दूसरा तेज। तैजसशरीर और कार्माण शरीर ये दो सूक्ष्म शरीर जीव के साथ जाते हैं। तो बरबादी के कारणभूत ये कर्म हैं। ये कर्म कैसे दूर हों इस प्रकार का विचार करना और प्रयत्न करना यह कर्तव्य है।

कर्मों के दूर करने का उपाय अपने आत्मा की सम्हाल है क्योंकि कर्म तब बनते हैं जब आत्मा की सम्हाल नहीं रहती है। तो ऐसी शुद्ध अवस्था पाकर ये कर्म बंध जाते हैं।जब हम अपनी सम्हाल रखेंगे तो कर्म अपने आप न बँधेंगे। कर्मों पर दृष्टि डालते हुए कि हमें तो इन्हें नष्ट करना है। इस तरह से कर्म नष्ट होंगे अपने आत्मा की सम्हाल करने से। तो उन कर्मों की चर्चा चल रही है जो जीव के साथ ये अष्ट कर्म लगे हैं, जिनमें प्रथम ज्ञानावरण कर्म हैं, जिसके कारण 5 प्रकार का ज्ञान प्रकट नहीं हो पाता। ज्ञान तो एक ही प्रकार का है। आत्मा हे और उसका स्वरूप ज्ञान है। सो आत्मा का जो स्वरूप ज्ञान हैवह तो एक ही प्रकार का है। ज्ञानज्योति है, सामान्य तत्त्व है, पर वह ज्ञान कर्मबंधन की हालत होने के कारण उस ज्ञान को कुछ भेदों में बांट दिया गया है। ज्ञान 5 प्रकार के हैं―मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान। जिनके केवलज्ञान प्रकट है उनके ज्ञानावरण कर्मों के पूर्ण क्षय से प्रकट है। अपने स्वरूप की प्रतीति हो, अपने कैवल्य स्वरूप पर दृष्टि रहे तो इस प्रयत्न से केवलज्ञान होता है। केवलज्ञान होता हे समस्त विश्व के पदार्थों को जानने वाला विश्व के पदार्थों को जानने की कोशिश करें। केवलज्ञान होता है तब जब बाहर के जानन छोडकर अपने आपके अंतरंग का जानना बना रहे और अंत: ज्योति का ही आलंबन रहे। सब जीवों का इसी में कल्याण है कि अपने स्वरूप का शुद्ध विकास हो। और बातों में कल्याण नहीं है। पर अच्छा ज्ञान बन गया, परिवार अच्छा मिल गया, वैभव जुड़ गया तो सब विकल्प के ही कारण होंगे। ये बरबादी के ही हेतु होंगे, इनसे आत्मा का कुछ भी कल्याण न होगा। आत्मा का कल्याण केवल विचारने में है। जैसा सहजस्वरूप है अपने सत्त्व के कारण जैसा अपने में स्वरूप है उस स्वरूपमात्र प्रतीति और उपयोग रखने से केवलज्ञान प्रकट होता है। और यहाँ निमित्तदृष्टि से कहा कि ज्ञानावरण कर्म का क्षय होने से ही केवलज्ञान होता है। अब चार ज्ञान रहे―मति, श्रुत, अवधि और मन:पर्यय। ये चार ज्ञान कर्मों के क्षयों से प्रकट होते हैं। प्रकृतियाँ भी 5 बन गयी ज्ञान के भेद से मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्यय ज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण। इन सभी के पूर्ण क्षय से केवलज्ञान होता है।

मतिज्ञान मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से प्रकट होता है। ये मतिज्ञान के ढाकने वाले जो कर्म लगे हैं उनमें कुछ का तो उदयाभावी क्षय है। उदय में आते और निष्फल खिर जाते हैं और उनका ही उपशम, उनमें से ही कुछ कर्मप्रकृतियाँदेशघाती का उदय ऐसी स्थिति में मतिज्ञान प्रकट होता है। इंद्रिय और मन की सहायता से जो पदार्थ का एक विशुद्ध ज्ञान होता है, जहाँ विकल्प नहीं है उसे मतिज्ञान कहते हैं और उस मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थ का जो विशेष ज्ञान होवे उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। जैसे आँखों से देखा और देखते ही वही चीज दिख गई। जब यह समझ में आ रहा वही तो श्रुतज्ञान हुआ और उससे पहिले दिख गया तो यह चीज वही है इस तरह का विकल्प न होना चाहिए वही चीज है, वह मतिज्ञान हुआ, और मोटेरूप में यों समझिये कि जैसे घर में कोई बच्चा जन्म लेता है तो कुछ दिनों तक वह बच्चा घर में माँ-बाप, भाई-बहिन, भींट आदिक सभी को देखता है पर उसके मन में कभी ऐसा विकल्प नहीं होता कि यह मेरा अमुक है, उसे कुछ पता ही नहीं है तो यह श्रुतज्ञान है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान से खाली यह संसार नहीं है। तीसरा है अवधिज्ञान। अवधि ज्ञानावरण के क्षयोपशम से ऐसा ज्ञान प्रकट होता है कि यह ज्ञानी जीव मन और इंद्रिय की सहायता के बिना जानता है, आत्मीय शक्ति से जानता है। भूत भविष्य की बात जानता है, यहाँ वहाँ के लंबे क्षेत्र की बात जानता है, पर जानता है पुद्गल को। वह अवधिज्ञान कहलाता है। उस अवधिज्ञान को जो प्रकट न होने दे उसे अवधिज्ञानावरण कहते हैं। देखो हम आपमें अवधिज्ञान की शक्ति पड़ी हुई है, पर ये सब धर्मपालन के प्रभाव से स्वयं प्रकट होते हैं। ऋद्धि सिद्धि ज्ञान ये धर्मपालन के प्रभाव से विकसित हैं। धर्मपालन यही है कि आत्मा का धर्म है चैतन्यस्वभाव, उस रूप अपने को मानना यही धर्म का पालन है, यही ज्ञान के विकास का उपाय है। बाहर में ज्ञान जोड़-जोड़कर बड़ा ज्ञानी कोई नहीं बन सकता। अपने ज्ञानभाव का आश्रय लेकर यह ज्ञानी बनता है, इस कारण योगीश्वर ऐसा ही योग करते हैं कि अपने आपको एक चैतन्यस्वभाव अनुभव करते हैं। यह परमात्मा का प्रकाशक एक योग है। मन:पर्ययज्ञान से दूसरे के मन की बात जानते हैं। यह भी मन:पर्ययज्ञान ज्ञानावरण के क्षयोपशम से प्रकट है। यह अवधिज्ञान से बड़ी ऋद्धि है। और केवलज्ञान होता है 5 प्रकार के ज्ञानावरण के क्षय से। इस तरह जो 5 ज्ञानों का आवरण करता है उसे ज्ञानावरण कहते हैं। जीव के साथ जो कर्म लगे हैं उनमें प्रथम ज्ञानावरण का वर्णन किया।


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