• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1651

From जैनकोष



नवभेदं मतं कर्म दृगावरणसंज्ञकम्।

रुद्धयते येन जंतूनां शश्वदिष्टार्थदर्शनम्।।1651।।

दूसरा कर्म लगा है जीव के साथ दर्शनावरण। जो दर्शन गुण को प्रकट न होने दे उसे दर्शनावरण कहते हैं। आत्मा में जैसा ज्ञानगुण है, जिसके विकास में यह अनेक पदार्थों को जानता रहता है। यह पुस्तक है, यह चटाई है, यह अमुक है, इस वस्तु का यह स्वरूप है, ये सब ज्ञान हम आपको जो होते हैं वे ज्ञानगुण के विकास हैं। पर एक मर्म की बात और जानें कि दर्शन गुण न हो तो ज्ञानगुण भी ठहर नहीं सकता, सत्ता नहीं रख सकता। ज्ञानगुण से सब कुछ जाना और सब कुछ जानने रूप अपने आपका प्रतिभास भी चलता है तो ज्ञान की प्रतिष्ठा होती है। दर्शनगुण न हो तो ज्ञान की प्रतिष्ठा नहीं रह सकती। ये चैत सके दोनों स्वरूप हैं―ज्ञान और दर्शन।तो उस दर्शनगुण जो प्रकट न होने दे उसे दर्शनावरण कहते हैं। ऐसे दर्शनावरण 9 प्रकार के हैं―चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शन, केवलदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, निद्रा-निद्रा दर्शनावरण, प्रचलादर्शनावरण, सत्यानगृद्धिदर्शनावरण आदि। यह सब अपनी बात चल रही है कि अपने में जो दर्शन और ज्ञानगुण हैं वे कर्मबद्ध की हालत में किस-किस प्रकाश में नहीं आते, उसका वर्णन चल रहा है। चक्षुइंद्रिय से जो हमें ज्ञान प्रकट होता है उस ज्ञान से पहिले जो दर्शन का विकास है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं। आँखों से दिखता नहीं है, आँखों से तो ज्ञान होता है। दिखना होता है दर्शनगुण से। जैसे कानों से देखते नहीं हैं, कानों से ज्ञान होता है। ऐसे ही सभी इंद्रियों से दिखता नहीं हे किंतु ज्ञान होता है। लोग रूढ़िवश कह देते हैं कि आँखों से दर्शन होते हैं। जो नेत्रों से देखने में ढाके, प्रकट न होने दे उसे चक्षुदर्शनावरण कहते हैं। और आँखों से छोडकर शेष के 4 इंद्रिय और मन के द्वारा जो हमें ज्ञान उत्पन्न होता है उस ज्ञान से पहिले जो सामान्य प्रतिभास है उसे अचक्षुदर्शन कहते हैं। उसे जो प्रकट न होने दे उस कर्म का नाम है अचक्षुदर्शनावरण दर्शन और ज्ञान का कुछ अंतर जानने के लिए एक दृष्टांत लें। जैसे लड़के लोगों का ऊँची कूद कूदने का एक खेल होता है। तो लड़के दौड़कर फिर जिस जगह से कूदते हैं उस जगह पर वे पहिले नीचे वजन देते हैं तब उठकर फांदते हैं। यह तो सभी के अनुभव की बात है। वे लड़के जितना ही नीचे को वज़न देकर कूदेंगे उतनी ही ऊँची कूद कूद सकेंगे। तो ऐसे ही समझिये कि आत्मा जब इन पदार्थों को जानता है तो उन जाननों से पहिले आत्मा यह अपने आपका आलंबन लेता है तब यह ज्ञानगुण प्रकट करता है। पहिले यह अपना सामान्य प्रतिभास करता है तब ज्ञानगुण भी विकास करता है। तो अचक्षुदर्शनावरण के बाद अवधिदर्शनावरण, अवधिज्ञान होने से पहिले जो सामान्य प्रतिभास होता है उसे अवधिदर्शनावरण कहते हैं। उस अवधिदर्शन को जो प्रकट न होने दे उसे अवधिदर्शनावरण कहते हैं। एक साथ केवलदर्शनावरण केवलज्ञान के साथ-साथ जो सामान्य प्रतिभास रहता है उसे केवलज्ञान कहते हैं और उसे जो प्रकट न होने दे उसे केवलदर्शनावरण कहते हैं। ये 4 हुए दर्शनावरण और 5 होती हैं ऐसी स्थितियाँकि जिनके आत्मा के दर्शनगुण का उपयोग नहीं रहता।

निद्रा नाम की प्रकृति के उदय में ये पशु पक्षी मनुष्य सभी सो जाते हैं तो सोई हुई हालत में न ज्ञान का उपयोग है, न दर्शन का, वैसा ही मुर्दा जैसा पड़ा है। देखो मुर्दा जैसा नींद में पड़ जाता पर लोग जान-जानकर मुर्दा जैसा पड़ जाने की बात चाहते हैं। जब श्रम किया तो श्रम के निवारण के लिए निद्रा आती है, लेकिन जो लोग श्रम नहीं करते और मन के विकल्प मचाते रहते हैं, मन ही मन का व्यापार करते हैं, परिश्रम कुछ नहीं, न मूलधन लगाया, जैसे सट्टा, जुवा और तरह की बात या केवल जो धन संपन्न होने पर लोग इज्जत, प्रशंसा आदिक के प्रयत्न किया करते हैं उन्हें निद्रा नहीं आती। निद्रा आती है उनको जो बड़ा शारीरिक और मानसिक परिश्रम करते हैं। निद्रा नामक प्रकृति के उदय से ये मनुष्य, पशु-पक्षीसभी सोते हैं। ये पेड़-पौधे भी सोते हैं, नींद लेते हैं पर ये अपने ढंग से नींद लेते हैं। आँखें बंद करके जो सो जाय उसी का नाम निद्रा लेना नहीं है। जहाँबाहरी बातों की कुछ भी खबर न रहे उसे निद्रा लेना कहते हैं। तो निद्रा प्रकृति के उदय में नींद आती है, और जीव को ऐसी नींद आती है कि सो लेने पर उसे कोई जगा भी दे तो वह फिर सो जाता है। जैसे बहुत से बच्चों को देखा होगा। कहीं शास्त्रसभा वगैरह में बैठे हैं, बच्चे को भी साथ में ले आये, बच्चा सो गया। शास्त्र खतम होने पर उसने उस बच्चे को उठाया और जरा सा ढीला कर दिया तो वह झट जमीन में पड़कर फिर सो जाता है। तो नींद लेकर भी नींद लेवे उसे निद्रा कहते हैं, उसमें बेहोशी अधिक है। प्रचला प्रकृति के उदय में जीव के प्रचला बनती है। जैसे कुछ सोये हुए और कुछ जगेहुए बैठे हैं, चलते-चलते भी सोते जाते हैं, यहाँ भी जैसे कुछ शास्त्र भी सुनते जाते हैं और कुछ सोते भी जाते हैं, उनसे अगर बीच में कुछ पूछो टोको तो एक-आध बात बता भी देते हैं। तो प्रचला प्रकृति के उदय में जीव को ऐसी निद्रा आती है कि कुछ निद्रा है, कुछ जगा हुआ है। प्रचला प्रकृति के उदय में नींद के अलावा जीव के अंग चलायमान होते हैं, जैसे दाँत कटकटाना, मुख से लार बहना आदि। उसे कहते हैं प्रचला-प्रचलादर्शनावरण। अंतिम ज्ञानावरण है सत्यानगृद्धि दर्शनावरण। सोने के पहिले कोई काम करे और सोकर जगने के बाद पता न हो कि मैंने क्या किया था जैसे सोते हुए में कमरे से उठाकर इस तरह से किवाड़ खोलकर दर्शन कर आये और फिर बिस्तर में पड़ कर सो गया और जगने पर उससे आकर कोई कहे कि तु मंदिर गए थे? और वह कहे कि हमें कुछ ध्यान नहीं हे तो उसे सत्यानगृद्धि दर्शनावरण कहते हैं। सत्यानगृद्धि दर्शनावरण में निद्रा की विशेषता है। इस प्रकार 9 कर्मों के दर्शनावरण होते हैं जो आत्मा के दर्शनगुण को प्रगट नहीं होने देते। ये ही दो गुण जीव में मुख्य हैं―ज्ञान और दर्शन।जीव में प्राण ये हैं―ज्ञान और दर्शन।शरीर में बस रहे हैं शरीर के अंग भी ऐसे हैं कि दब जायें तो प्राणांत हो जायें। आयु है, श्वास है, ये प्राण बताये गए हैं पर ये आत्मा के कुछ नहीं हैं। वृद्ध हालत में शरीर घात में यह प्राणघात करना पड़ता है। पर जीव का वास्तविक प्राण तो ज्ञान और दर्शन है, जिस प्राण के नष्ट हो जाने पर चीज खतम हो जाती है। तो बात कहते हैं आत्मा में ज्ञानदर्शन न रहे तो जीव के साथ ही न रह सका फिर जावे क्या? जहाँज्ञान नहीं है, दर्शन नहीं है, वह ज्ञान है क्या? ज्ञानदर्शन प्राण बिना जीव के कभी नहीं होते। इसलिए जीव को अमर कहा है। तो यह ज्ञानतत्त्व कभी नष्ट नहीं हो सकता। शरीर छूट जायगा, अगले भव में चला जायगा पर ज्ञानदर्शन साथ जायगा और मुक्त होने पर भी ज्ञानदर्शन साथ जायगा। कर्म ये सब यही रह जायेंगे और ज्ञानदर्शन प्राण कभी नष्ट नहीं होते। ऐसा जानता है ज्ञानी पुरुष, इस कारण उसे मरण का भय नहीं रहता। जो अपने स्वरूप पर दृष्टि देगा और स्वरूपमात्र अपने को मानेगा उसको मरण का भय नहीं होता, और मरण का भय प्राय: सभी संसारी जीवों के लगा है। कोई मरता नहीं है, मरण नहीं चाहता। और मरना है इसलिए उसका दु:ख है। ज्ञानी जीव तो यह जानता है कि मेरा तो मरण नहीं है। मैं सद्भूत वस्तु हूँ, सदाकाल रहूँगा, मेरा स्वरूप ज्ञानदर्शन है वह सदा रहेगा, मेरा घात नहीं है, ऐसा जानकर ज्ञानी जीव मरण का भय नहीं करता। उन्हीं ज्ञानदर्शन का विकास का आवरण करने वाले ये दो प्रकार के ज्ञान बनाये गए। ज्ञानावरण और दर्शनावरण इनके क्षय से पूर्ण ज्ञान पूर्ण दर्शन प्रकअ होता है।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_1651&oldid=83584"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki