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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1654

From जैनकोष



असद्वेद्योदयात्तीव्रं शारीरं मानसं द्विधा।

जीवो विसह्यते दु:खं शश्वच्छ्वभादिभूमिषु।।1654।।

असाता वेदनीय के उदय से शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के दु:ख होते हैं।दु:ख होते हैं दो प्रकार के―शारीरिक और मानसिक। दु:खों को जोड़ लीजिए, उन दोनों का बंटवारा इन दो में मिलेगा―एक शारीरिक दु:ख और दूसरा मानसिक दु:ख। सभी दु:खों पर दृष्टि डालिए। शरीर में रोग हो, फोड़ा फंसी हो, बुखार आदिक हो, चोट लग जाय, कमर दु:खने लगे, ऐसी जब स्थिति बनती हे तो उनके शारीरिक दु:ख है और जहाँ मन के विचार से दु:ख बनता है ये सब मानसिक दु:ख हैं। जैसे अपमान हो गया, निंदा हो गयी, सम्मान न हो सका अथवा किसी रिश्तेदार से बिगाड़हो गया, या किसी इष्ट की मरणासन्न स्थिति हो गयी, या कोई दु:ख ऐसे हो गए कि जिन दु:खों से अपने शरीर का तो संबंध है नहीं, अपने शरीर पर कोई प्रहार हुआ नहीं और मन से ही विचार किया कि दु:ख बढ़ा लिया, कोई बड़ी तीव्र वेदना हो जाय तो उसका दु:ख देखकर पिता को जो क्लेश होता है वह शारीरिक है या मानसिक है? शारीरिक दु:ख नहीं है। यदि घबड़ाकर, बड़ा दु:खी होकर अपने सिर में ढेला मार ले उस पुत्र के दु:ख को देखकर, सिर में दर्द हो गया वह तो है शारीरिक और उस पुत्र के प्रति जो उसने विकल्प बनाये वह हे मानसिक वेदना। असाता वेदनीय के उदय में दो प्रकार के दु:ख होते हैं―एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। तो इन दु:खों को दु:खरूप से भोगने वाले हैं नारकी जीव। नारकियों का शारीरिक दु:ख ऐसा है कि एक नारकी दूसरे नारकी को देखकर तीव्र प्रहार करता है, उन पर अनेक आक्रमण करता है। शरीर के तिल-तिल बराबर टुकड़े हो जाते हैं, इतने पर भी दु:खों से छुटकारा नहीं हो पाता। शरीर के परमाणु-परमाणु मिलकर फिर शरीररूप बनजाते हैं। ऐसा उनका वैक्रियक शरीर है। वे नारकी दूसरे नारकी को अधिक से अधिक वेदना पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं, कोल्हू में पेले, आग में जला दें, हथियारों से शरीर के खंड-खंड कर दें, सर्प, बिच्छू आदि बनकर शरीर को डस लें, अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हैं वे नारकी जीव। एक जीव दूसरे जीव पर आक्रमण करे तो क्या वह बिना मानसिक दु:ख के कर सकता है? मारने वाले नारकी को मानसिक दु:ख अधिक है और मरने वाले शारीरिक दु:ख अधिक है, पर वहाँ किसी नारकी को ऐसा अधिकार नहीं दिया गया कि यह मारने वाला नारकी है और यह मरने वाला नारकी है।तो नरकों में रहने वाले जीवों को शारीरिक दु:ख और मानसिक दु:ख ये दोनों होते हैं। अथवा असाता वेदनीय का तीव्र उदयहै। फिर नारकियों के अलावा अब यहाँ मध्यलोक में देख लीजिए, मध्यलोक के मनुष्यों का दु:ख देख लीजिए। शारीरिक दु:ख तो लगे हुए हैं। अभी देखिये―दोनों समय रसोई बनाते हैं पेट भर खाते भी हैं, ऐसा किए बिना गुजारा भी नहीं होता, शारीरिक दु:ख भी अनेक साथ में लगे हुए हैं। मानसिक दु:खों की बात देखो―सभी सबेरा होते ही नहाते धोते हैं, पूजन चंदन आदि के कार्य करते हैं, बिना नहाये, बिना मंदिर दर्शन किए खाना नहीं खाते हैं। यात्रा का भाव मन में रखते हैं, नहाते धोते हैं, दोनों बार खाना बनाते हैं, खाते हैं, ऐसा किए बिना गुजारा भी कैसे हो? यह कितना साता वेदनीय का उदय है, हालांकि भोजन मिलता है, और खाते हैं, पर वह साता वेदनीय के उदय में मिलता है। मगर अशांति देखिये―कितनी उसमें भरी पड़ी हुई है? कितनी अशांति इन मनुष्यों ने जान बूझकरबढ़ाया है। जो लोग संयमी बने हुए हैं उनको कुछ शांति रहती है। कोई भी व्यक्ति हो, यदि वह एक ही बार खाने का नियम रखता है तो उसे बड़ी धीरता है। एक बार भोजन होने के बाद फिर तो कोई क्षुधा का क्लेश नहीं है। और खाने के बाद के क्षुधा संबंधी क्लेश कल्पना बनाने के होंगे। संयम के साथ-साथ सच्चा ज्ञान भी चाहिए, नहीं तो कोरे असंयम से वह अपनी अशांति और बढ़ा लेगा। संयम के बिना बहुत अशांति बढ़ जाती है। तिर्यंचों में देखो तो शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के दु:ख बराबर चलते हैं। घोड़ा, गधा, बैल, भैंसा आदि जानवरों को देखो―ये कितना-कितना बोझ भी लाद लेते हैं, कंधे सूझ जाते हैं और पिटते भी रहते हैं उनको ऐसी दशा में देखकर क्या हम आपके मन में यह नहीं आ जाता कि ये बेचारे क्या सोचते होंगे? बेचारों की नाक भी छिदी हुई, नकेल पड़ी हुई है, कहीं जा भी नहीं सकते, चाहे कितना ही मारे वह तो मालिक के हाथ बात है। तो कितनी-कितनी पराधीनतावों के संताप ये जीव सह रहे हैं? इस असाता वेदनीय के उदय से ये शारीरिक और मानसिक दु:ख होते हैं। देवों के देखो तो शारीरिक दु:खों की बात तो हम कुछ नहीं कह सकते। होते होंगे कुछ न कुछ प्रकार के दु:ख, मगर स्थूल रूप से जैसा कि वर्णन सुनने में आया है, उसके माफिक ऐसा विदित होता है कि शारीरिक दु:ख की बात उनके नहीं घटती। जब भूख लगती है तो कंठ से अमृत झरता है और उससे वे तृप्त हो जाते हैं। ठंड गरमी की वेदना भी उनके नहीं होती। बिच्छू सर्प आदिक जानवरों की बाधायें भी उनके नहीं होती, उनका वैक्रियक शरीर है, पर मानसिक दु:ख इतना होता हे कि जितना मानसिक दु:ख मनुष्यों के भी नहीं होता। उन इंद्रादिक देवों की आज्ञा में अनेक देव होते हैं, वे देव उनकी आज्ञा मानकर अपने को धन्य समझते हैं। तो ऐसे इंद्रों के सुखों का क्या ठिकाना, लेकिन मानसिक दु:ख इतने पड़े हुए हैं कि उनकी उपमा देने के लिए यहाँ मनुष्यों में कोई नहीं मिलता। बड़ी चिंता में पड़े हुए हैं, मन काबू में नहीं है। मनुष्यों में तो किसी मनुष्य को अगर अधिक मानसिक दु:ख हो जाय तो कहो हार्ट फैल हो जाय मगर उन देवों के इतना मानसिक दु:ख बढ़ जाता है पर उनका हार्ट फैल नहीं होता। मानसिक दु:ख मनुष्यों के मानसिक दु:ख से देवों में अधिक हैं। ये वेदनीय कर्म जीव के स्वरूप नहीं हैं और वेदनीय कर्म के उदय से जो बात इस जीव के बनती है वह भी इस जीव का स्वरूप नहीं है। इससे निराला केवल ज्ञानमात्र चैतन्यमात्र यह मैं अंतस्तत्त्व हूँ, आत्मा हूँ, ऐसी दृष्टि ज्ञानी पुरुष रखता है।


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