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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1655

From जैनकोष



दृष्टिमोहप्रकोपेन दृष्टि: साध्वी विलुप्यते।

तद्विलोपांनिमज्जंति प्राणिन: श्वभ्रसागरे।।1655।।

जीव के साथ 8 प्रकार के कर्म बंधे हैं। उन सब कर्मों में प्रबल कर्म है मोहनीय कर्म। मोहनीय कर्म है तो सब बाकी के कर्म मौज मानते हैं और जहाँमोहनीय कर्म नष्ट हुआ तो सभी कर्म शिथिल हो जाते हैं, अपनी हार मान बैठते हैं। इसीलिए सभी कर्मों का राजा मोहनीयकर्म का विकास है जब तक अन्य किसी भी कर्म की सत्ता नष्ट नहीं होती और मोहनीयकर्म सत्ता नष्ट हुई कि धीरे-धीरे सब कर्मों की सत्ता नष्ट हो गई। मोहनीयकर्म है दो प्रकार का―दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय। दर्शनमोहनीय तो उसे कहते हैं जो आत्मा के सम्यक्त्व गुण को मोहित कर दे, नष्ट कर दे। आत्मा में सम्यग्दर्शन पैदा न हो सके, जिस कर्म के उदय से उसका नाम है दर्शन मोहनीय और जिस कर्म के उदय से आत्मा चारित्र, तप, व्रत, संयम अपने आपमें मग्न होना ये चारित्र न पाल सके उसे कहते हैं चारित्रमोहनीयकर्म। सो दर्शनमोहनीय के 3 भेद हैं―मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति। असली तो मिथ्यात्व ही है। मिथ्यात्व उसे कहते हैं जिसके उदय से जीव में मिथ्यादर्शन बने। बंधता मिथ्यात्व ही है जीव में लेकिन जब अच्छा परिणाम होता है तो मिथ्यात्व कर्म कुचल दिया जाता है। जैसे जंती से मूंग को या चना को दल देवे तो वहाँ 3 चीजें प्रगट होती हैं―कोई चना साबुत निकल आता, कुछ दाल निकल आती और कुछ चूरा हो जाता है। इसी तरह से जब सम्यग्ज्ञान का परिणाम होता है उपशम सम्यग्दर्शन के प्रारंभ होते ही मिथ्यात्व कर्म दल दिया जाता है सो उसके तीन हिस्से हो जाते हैं तो कुछ तो बराबर मिथ्यात्व ही रह जाता है और कुछ मिथ्यात्व के दो दल हो जाते हैं। सम्यग्मिथ्यात्व याने सम्यक्त्वरूप परिणाम होने का नाम है दो दल हो जाते हैं। कुछ का चूरा हो जाता है। जो चूरा हो गया है मिथ्यात्व का उसे कहते हैं सम्यक्त्वमोहनीय। इन तीनों के अलग-अलग काम हैं। मिथ्यात्व का काम है सम्यग्दर्शन को रंचमात्र भी प्रकट न होने देना और जो-जो दल हैं याने सम्यक्त्व है उसका काम है जीव में सम्यक् और मिथ्यात्व रूप परिणाम बनाये रहना, न पूरा सम्यक्त्व है, न पूरा मिथ्यात्व है। और सम्यक्त्व मोहनीय कर्म का काम है जो जीव के भेद बनाता हे कि सम्यग्दर्शन तो रहे पर उसमें चल मलिन अगाढ़ दोष उत्पन्न करे। जैसे बूढ़ा आदमी चलता तो खूब है पर लाठी की वजह से चलता है, लाठी की वजह से वह बूढ़ा गिरता तो नहीं है पर चल मल होता है, ऐसे ही सम्यग्दर्शन में दर्शन मोहनीय का काम हुआ आत्मा के सम्यक्त्व का लाभ न होने देना। यह जीव के साथ अनादि काल से बंधे हुए हैं जिसके कारण हम आप सब बरबाद होते चले आ रहे हैं। जिस भव में गए उसी भव में जो परिजन मिल गए उनमें मोह किया, पर उनसे मिला कुछ नहीं। मरने के बाद तो फिर उनकी कुछ खबर भी नहीं रहती। तो मिथ्यात्व के उदय में यह जीव अब तक बरबाद होता चला आया। सो वास्तविकता वहाँ भी है कि कर्म का जो उदय है वह निमित्त मात्र है, मगर जीव खुद अपने में भूल कर डालता है। परपदार्थों की ओर दृष्टि लगाकर अपने को बरबाद कर रहे हैं।


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