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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1666

From जैनकोष



द्रव्याद्युत्कृष्टसामग्रीमासाद्योग्रतपोबलात्।

कर्माणि घातयंत्युच्चैस्तूर्यध्यानेन योगिन:।।1666।।

व्यतीत हुए अनंत समयों के बाद जिस किसी भी निकट भव्य जीव को अपने आपके स्वरूप का बोध होता है उस मुनि पुरुष के यहाँ विपाकविचय धर्मध्यान की चर्चा चल रही है। कर्मफल का चिंतवन करना सो विपाकविचय धर्मध्यान है। कर्म क्याहैं, मैं क्या हूँ, फल क्याहै, भेदविज्ञान विधिपूर्वक जिसमें स्वातंत्र्य की सुधि न भूलें इस पद्धति पूर्वक कर्मविपाक का चिंतवन होना और विपाक तो एक उपलक्षण शब्द है। कर्म के सम्वर निर्जरा आदिक का चिंतवन होना वह सब विपाकविचय धर्मध्यान है। ये कर्म कैसे दूर होते हैं, उनके दूर करने के लिए कर्मों के बारे में हम दृष्टि गड़ायें, उनकी जानकारी बनायें। उनके सामने रखकर उन्हें एक-एक पकड़कर निषेक करके उनका उत्पीड़न करना यह तो बात बन नहीं पाती। उसके उपाय में अपने सम्हाल की बात है। अपनी सम्हाल हुई कि कर्मों का निर्जरण होगा। अपनी सम्हाल के बिना अपनी रक्षा नहीं है। और अपनी सम्हाल यह है कि हम अपने स्वरूप का यथार्थ परिज्ञान करें। मैं क्या हूँ? जिसने यह निर्णय नहीं कर पाया कि मैं क्या हूँवह अपने बारे में और करेगा क्या? शांतिमार्ग निभेगा कहाँ से? इस कारण सर्वप्रथम अपने निर्णय की धुन होना चाहिए।मैं क्या हूँ? समझ तो जाऊँ खुद को, यह खुद बला है अथवा कोई वैभवहै। जिसने खुद को अन्य रूप से जाना उसके लिए तो बला है और जिसने स्वयं का जैसा मेरा स्वरूप है उस रूप से पहिचाना, उसके लिए वैभव है। यों साधारण शब्दों में कहो कि आत्मानुभव नहीं है एकेंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक। घोर मिथ्यादृष्टि से लेकर सिद्ध भगवान तक किसी जीव को आत्मानुभव नहीं है। आत्मानुभव बिना सुख-दु:ख की प्रक्रिया चल सकेगी क्या? अज्ञानी है वह भी अपना अनुभव कर रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि अज्ञानी अपने को अनात्मरूप से अनुभव रहा है। जो कुछ गुजरता है, जो रागद्वेष होता है तद्रूप आत्मा का अनुभव रहता है। इतने से ही महान अंतर हो गया। और ज्ञानी पुरुष महात्मा अंतरात्मा अपने आपका जैसा स्वयं स्वरूप है, सहज अपने सत्त्व के कारण जैसा जो कुछ बनाहै स्वरूप, उस रूप में अनुभवता है, पर उन सब अनुभवनों का नाम आत्मानुभव नहीं क्योंकि उन अनुभवनों की पद्धति का कुछ प्रयोजन नहीं, कोई हित की बात में आता नहीं है। वैसे अपने आपका पता सबको है। कोई अपने को मैं ऐसा हूँ, लखपति हूँ, धनी हूँ, ज्ञानी हूँ, समझदार हूँ, अमुकचंद हूँ, इतने बेटों का बाप हूँ आदिक रूप से अपने को जाने तो इसमें तत्त्व क्या निकला? लोक में सबसे बड़ी गंदी भीख है दूसरों से प्रशंसा की चाह करना। इससे गंदी भीख और कुछ नहीं हो सकती। दो रोटियाँ कहीं सं मांग लावे तो वह उतनी गंदी भीख नहीं है, उससे पेट तो भरा, कुछ शांति तो मिली, जीवन तो चला। और कर्मों के प्रेरे, विभावों से मलिन, स्वयं जन्म-मरण के चक्र में बसे हुए स्वयं अनाथ। जिनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं, अज्ञान अंधेरे में पड़े ये लोग, इनसे यह आशा रखना, इनसे यह चाह करना कि ये लोग मुझे अच्छा समझ लें। मेरे बारे में कुछ प्रशंसा कर दें, इस प्रकार उनसे प्रशंसा बड़प्पन की कुछ भी बात चाहना इससे बड़ी भीख और किसे कहा जाय? न इससे अपनी आजीविका का काम बनता और न परलोक का सुधार होता, ऐसी आशा बनाना बहुत गंदी बात है। ज्ञानी पुरुष के ऐसी अंत: आकांक्षाएँ नहीं होती। उसे स्पष्ट स्वरूप सामने बना हुआ है। आत्मा की सम्हाल में सब सम्हाल है। आत्मा की सुध भूलने में सब विडंबनाएँ हैं। सो कर्म निर्जरण के संबंध में कहा जा रहा है कि योगीश्वर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की उत्कृष्ट सामग्री को प्राप्त होकर तीव्र तप के वश से इस विपाकविचय धर्मध्यान के मुख्य संस्थानविचय का आश्रय करके कर्म निर्जरण करता है।

महिमा हे सब अपने निकट पहुँचने की। जिस विधि से जिस ध्यान से, जिस चिंतन से, पर से उपयोग हटे। अपने स्वरूप की ओर उपयोग लगे, महिमा उसकी है। जितने भी धर्म कर्तव्य हैं उन सब कर्तव्यों की करतूत में महिमा उसकी हे जितना कि यह मोह से हटकर अपने आपमें विश्राम पाने की स्थिति पाता है। कोई कहे कि धर्मपालन करने में क्या करनाहै तो उसके दसों उत्तर न होंगे, और दसों उत्तर होंगे तो वे धर्मपालन के साधनरूप होंगे। उसका उत्तर एक होगा। धर्मपालन करे अर्थात् अपने स्वरूप की समझ करके उसका ही उपयोग बनाये रहें, यही है धर्मपालन। ऐसी स्थिति बनाने के लिए तो कुछ हम करते हैं व्रत लें, नियम लें, तत्त्वाभ्यास करें, स्वाध्याय करें, गुरुसेवा करें, जो कुछ भी करें वह धर्मपालन कहलाने लगे। क्योंकि उन सब कर्तव्यों का उद्देश्य यह परमार्थ धर्मपालन है। तो अपने आपको जानना और अपने आपके उस स्वरूप का उपयोग रखना यही है धर्मपालन। इसके लिए ही यह सब चिंतन चल रहा है। वस्तु के एकत्व का परिचय पा लेना यही है दुर्लभ वैभव की प्राप्ति। इस ही को कहते है यथार्थ ज्ञान। प्रत्येक पदार्थ पर से अलिप्त है। स्वयं के स्वरूप चतुष्टय में तन्मय है। इस प्रकार का जो तत्त्वदर्शन होता है वह है यथार्थ प्रकाश। और इस प्रकाश को पाकर यह ज्ञानी जीव परतत्त्वों से विकल्प तोड़कर अपने आपके आनंद स्वभाव में उपयोगी होता है। यह बात जिस किसी भी चिंतन से आये वह चिंतन भी जयवंत के योग्य है। जिसे अपने आत्मस्वरूप का कुछ बोध हो गया है वह किसी बालक के मुख से कुछ शब्दों को ही सुनकर अपने हित की बात प्राप्त कर लेता है। इस जीव ने भव-भव में अनेक साधनपाये पर एक आत्मतत्त्व का अनुभव नहीं प्राप्त किया। अनादिकाल से अनंत परिवर्तन किया, उन सब भ्रमणों में इस जीव ने ऐसी-ऐसी चाह की कि सारे जगत पर मैं एक छत्र राज्य करूँ। उसका स्वामी बनूँ। इसने पंचेंद्रिय के विषयों में भव-भव में बहुत-बहुत रमण किया, बहुत-बहुत सी चीजें अपने अन्डर में किया पर आज देखो तो यह रीता का ही रीता है। इसने काम विकार भोग संबंधी कषायें तो बहुत सुनी, पर अपने आपकी बात जो अपने अंत:प्रकाशमान है उसको कभी नहीं सुना। यह अंत:प्रकाश अपने आपमें स्थित है पर कभी इसका उपयोग नहीं किया। इस जीव ने अपने को विषयकषायों से मिला-जुला अनुभव किया पर जो परमात्मतत्त्व है, समयसार है वह दब गया। उसकी जानकारी अब नहीं रही। स्वयं को नहीं जानना चाहा, दूसरों को जानकारीमें लिया पर उसकी उपासना नहीं करना चाहा। अब कैसे इसका मार्ग प्रकट हो? अपने आपके इस एकत्व स्वरूप का अपने ही सत्त्व के कारण जो कुछ उसका स्वरूप है उस स्वरूप का परिचय नहीं है, इसीलिए संसार में इतनी भटकनाएँबन गयी। खूब तो शास्त्राभ्यास करे और अच्छी सत्संगति बनाये, ये दो बातें मुख्य हैं अपने आपके उद्धार के लिए। और ऐसी अपनी कोई चर्चा बनेगी, उसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव ये सब मिलेंगे, जिस उत्कृष्ट सामग्री को पाकर यह जीव कर्मों की निर्जरा करता है।


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